बंधन चाहने से बंधन मिलता है और मुक्ति चाहने से भी बंधन ही मिलता है

जो तुम्हारे सुन्दरतम सपने हैं, वो साकार हो भी गए, ईमानदारी से बताओ, संतुष्ट हो जाओगे? और ऐसा तो नहीं है कि कभी तुम्हारा कोई स्वप्न साकार हुआ नहीं है, कभी-कभी तो तुम्हारी चाहतें पूरी भी हुई हैं।
उनसे खिल गए तुम? उनसे भर गए तुम? उधर माने क्या? उधर माने स्वप्न, उधर माने चाहतों का, भविष्य का, हसरतों का संसार, उधर माने कल्पना। इन कल्पनाओं ने तुम्हें कोई पूर्ति दी है आज तक? दी है? नहीं दी है, तो अब कैसे दे देंगी? जो आज तक नहीं हुआ, क्यों उम्मीद कर रहे हो कि तुम्हारी ज़िन्दगी के चंद बचे हुए सालों में हो जाएगा?
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अहंकार सीमाएं है

अहंकार जब भी घोषणा करता है, तो अपने सीमित होने की ही करता है। अहंकार की प्रत्येक घोषणा, बस इतनी सी है, ‘’मैं छोटा हूँ। मैं छोटा हूँ और इस बात से डरता हूँ। इस कारण मैं अपने आपको थोड़ा बढ़ा-चढ़ा कर बता रहा हूँ।’’

अहंकार अपने छोटे-पन का अहसास है। अहंकार अपनी सीमितता का अहसास है।
कृष्ण उस अहसास से ऊपर उठ गए हैं तो इसलिए कृष्ण इस ‘मैं’ शब्द का बड़े निरहंकारी रूप में प्रयोग कर रहे हैं। जब कृष्ण बोलते हैं ‘मैं’, तो फिर कृष्ण नहीं हैं, ‘मैं’। वो समस्त अस्तित्व की बात कर रहे हैं। जो कृष्ण का ‘मैं’ है, यह कोई शरीर में सीमित ‘मैं’ नहीं है। यह वो ‘मैं’ है, जो पूरे अस्तित्व में व्याप्त है, फैला ही हुआ है। धूल-धूल में फैला हुआ है और यह काम एक अहंकारी आदमी नहीं कर सकता।
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भक्ति योग एवं पुरुषोत्तम योग आचार्य प्रशांत के साथ
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हम दूसरों से अलग अनूठे कैसे बनें?

तुम अपनी बात करने में बहुत घबराते हो, यहीं पर गलती हो रही है। तुम कह रहे हो, समय और ऊर्जा नष्ट हो रहे हैं, समय और ऊर्जा नहीं, पूरा जीवन नष्ट हो रहा है क्योंकि तुम ‘मैं’ बनने को तैयार नहीं हो। ‘मैं’ का अर्थ होता है, मेरी ज़िम्मेदारी, मेरी। अपने पाओं पर खड़ा हूँ, अपनी दृष्टि से देखता हूँ, अपनी समझ से समझता हूँ और फिर मेरा समय, मेरा है, अब समय नष्ट नहीं होगा, फिर मेरी ऊर्जा मेरी है। अब ऊर्जा भी नष्ट नहीं होगी।
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अहंकार सीमाएं है

अहंकार का अपनी घोषणा करना हमेशा कुछ संदेह लेकर के आता है। आदमी के इतिहास में कितने लोग हुए हैं जिन्होंने अपनेआप को भगवान घोषित कर दिया? कितने हो पाए हैं? तुम अपनेआप को छोटी-मोटी चीज़ तो घोषित कर लेते हो — “मैं दानी, मैं पुण्य और भी बहुत कुछ”, पर जो भी करते हो, सीमित रहकर करते हो। बड़े से बड़ा अहंकारी यह नहीं बोलेगा कि, ‘मैं दुनिया का सबसे बड़ा दानी हूँ’ या ‘मैं इतिहास का सबसे बड़ा दानी हूँ’, और बोल भी देगा तो उसे शक पैदा हो जाएगा कि, ‘क्या पता? इतिहास में सब को तो मैं जानता नहीं। क्या पता, मैं हूँ कि नहीं!’

अहंकार जहाँ है, वहीं हीनता है, वहीं आत्म-शक है।

स्वाग्रह ही आत्म-शक है।
इसीलिए हम अपनेआप पर कभी पूरी तरह दावा नहीं कर पाते। मैं नहीं कह पाऊँगा कि, ‘मैं भगवान हूँ’, बड़ा मुश्किल हो जाना है।

ताकत मत माँगो, देखो कि क्या तुम कमज़ोर हो

कमज़ोरी का जवाब ताकत नहीं होती। कमज़ोरी का जवाब होता है: “कमज़ोरी के भाव का न होना” — यही ताकत है। किसी में यह भाव है कि ‘मैं कमज़ोर हूँ’ और किसी में यह भाव है कि ‘मैं ताकतवर हूँ’, यह दोनों ही बीमार लोग हैं। इतना ही काफ़ी है कि मैं न सोचूँ कि ‘मैं कमज़ोर हूँ’। और जो नहीं सोचेगा कि ‘मैं कमज़ोर हूँ’, वो यह भी नहीं सोचेगा कि ‘मैं ताकतवर हूँ’।

न ताकतवर हूँ न कमज़ोर हूँ; ‘बस हूँ’; और इतना काफ़ी है।

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