संवेदनशीलता ही वास्तविक सभ्यता है

शब्दों को ही नहीं पढ़ें, उसके भाव को भी पढ़ें। कहने वालों ने कहा है इसीलिए कि, जीवन अपनी कहानी पूरी तरह से कहता है पर मौन में कहता है। और फिर आप में बड़ी संवेदनशीलता चाहिए मौन की आवाज़ सुनने के लिए। पर हमें तो व्यक्त आवाजें भी सुनाई देनी बंद हो गई हैं। हमसे अगर कोई बोले कुछ आहिस्ता, हौले से कुछ बोले, तो हमें कहाँ समझ में आता है। चिल्लाना पड़ता है। चिल्लाना पड़ता है ना? तो मौन तो बिलकुल ही आहिस्ता बोलता है, वो तो फुसफुसाता भी नहीं है। शून्य सामान आवाज़ है उसकी, अनहद नाद है उसका, सुनाई ही नहीं पड़ेगा। तो इसी लिए हमें जीवन की कहानी का कुछ पता नहीं क्यूंकि जो भी सूक्ष्म है, उस पर न तो हमें ध्यान देना आता है, न ही सुनना आता है।
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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पूर्णता मुखर मौन है; तुम्हारी सारी कहानियाँ अपूर्णता की हैं

जब तक भविष्य रहेगा, तब तक हिंसा रहेगी औरआप तब तक अपने केंद्र से ही दुनिया को देखोगे। आप अपने केंद्र से ही अस्तित्व में जो कुछ है ,उसको देखोगे और उसका दोहन करना चाहोगे, शोषण करना चाहोगे। आप कहोगे, ‘’जो कुछ भी है, वो इसलिए है कि मेरे काम आ सके।’’ जंगल क्यों है? ‘’ताकि इसका पैदावार मुझे सुख दे सके।’’ जानवर क्यों हैं? ‘’ताकि मैं उन्हें खा सकूँ और उनसे श्रम ले सकूँ।’’ दूसरे क्यों हैं? ‘’ताकि मैं उनका किसी तरीके से इस्तेमाल कर सकूँ।’’ ये अहंकार का केंद्र रहेगा। आपको इस पर बैठना ही पड़ेगा। जब तक भविष्य है, तब तक अहंकार है। जब तक भविष्य है, तब तक हिंसा है।
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स्वयं का विसर्जन ही महादान है

दान वो नहीं जिसमें तुमने कुछ ऐसा छोड़ा, जो तुम्हारे पास है। दान की महत्ता इसलिए है, क्योंकि दान में तुम स्वयं को ही छोड़ देते हो और जिसको तुमने अपना आपा, अपना ‘मैं’, अपना स्वयं घोषित कर रखा है, वही तुम्हारा कष्ट है, वही तुम्हारा अहंकार है। वही तुम्हारे पाओं की बेड़ियाँ और अहंकार का बोझ है। जब तुम दान करते हो, तब तुम किसी और पर एहसान नहीं करते। जब तुम दान करते हो, तो अपने आप पर एहसान करते हो क्योंकि जो तुम दान कर रहे हो, वो वास्तव में तुम्हारी बीमारी है।
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आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 29 वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जा रहा है।
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दुनिया से प्रभावित क्यों हो जाता हूँ?

मन की एक स्थिति वैसी भी हो सकती है कि जिसमें कोई विषय उसके लिये महत्वपूर्ण ना रह जाए। मन अपने आप में समा जाए। मन कहे जितने भी विषय हैं, उन सबकी प्रकृति एक है; वो आते हैं जाते हैं। मुझे उनमें से कोई भी महत्वपूर्ण लगता नहीं क्योंकि जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, वो मेरे भीतर ही है। ना अच्छा महत्वपूर्ण है, ना बुरा महत्वपूर्ण है; जो महत्वपूर्ण है वो हमने पा लिया है, तो अब प्रभावित क्या होना।

अब पूरा खेल तुम्हारे सामने चलता रहेगा और तुम उसके मध्य में अनछुए से बैठे रहोगे। तुम्हारे चारों तरफ़ जैसे नदी बह रही हो और तुम उस नदी के केंद्र में बैठी हो और पानी तुम्हें स्पर्श ना कर पा रहा हो। ऐसी स्थिति हो जाएगी।
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अंधी शिक्षा का नतीजा है हिंसा

जो जितना शिक्षित है, वो उतना बर्बर है; यही तुम्हारी शिक्षा है क्यूँकी शिक्षा का जो मूलभूत ढांचा है, वही झूठा है। बचपन से तुम्हें

विनाश की ओर उन्मुख शिक्षा

जो जितना शिक्षित है, वो उतना बर्बर है; यही तुम्हारी शिक्षा है क्यूँकी शिक्षा का जो मूलभूत ढांचा है, वही झूठा है। बचपन से तुम्हें क्या पढ़ा दिया गया है? बचपन से तुम्हें यही सिखाया गया है कि गणित पढ़ लो, भाषाएँ पढ़ लो, हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत पढ़ लो। तुमसे कहा गया है कि इतिहास पढ़ लो पर तुम इतिहास नहीं हो। तुम जो हो, वो तुमको कभी कहा नहीं गया। तुमसे कहा भी नहीं गया कि क्षण भर को रुक कर के अपने आप को भी तो देख लो तो इसीलिए इस अंधी शिक्षा व्यवस्था से जो आदमी निकलता है, तो वैसा ही होता है।
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