आगे और करने का विचार उन्हीं को आता है जो अभी के काम में पूरे नहीं होते

आपका काम है ये जान लेना कि मैं नकली में फँसा हुआ हूँ और उसके आगे पूर्णविराम।

अब इसके आगे का हम नहीं जान सकते। इसके आगे का, जानने के क्षेत्र में आता ही नहीं तो हम जान कहाँ से लेंगे। हमने जान लिया कि ‘गड़बड़ है!’ और इस जानने के फलस्वरूप जो भी ईमानदारी से कर्म उपजा, वो हमने होने दिया।

ध्यान रखियेगा, इतना ही जाना है आपने कि बीमारी है; ‘स्वास्थ्य क्या है?’ ये नहीं जान लिया। कुछ होता होगा पर ये पक्का है कि वो नहीं है तो हम मज़े में नहीं हैं; वो नहीं है तो हमें अटपटा सा लगता है; वो नहीं है तो हमें घोर कष्ट होता है।

मुक्ति का पहला चरण – शरीर का सहज स्वीकार

जो शरीर को दबायेगा, शरीर उसके ऊपर छा जायेगा।
उसके रेशे-रेशे से, बस शरीर आवाज़ देगा, क्योंकि शरीर को तुम दबा सकते नहीं।
फिर शरीर इधर से, उधर से, हज़ार तिकड़में कर के, अपने आप को अभिव्यक्त करेगा।

जो जगह शरीर को नहीं लेनी चाहिये, उस जगह पर भी शरीर जा कर के बैठ जायेगा।
शरीर तुम्हारी पूजा भी बन जायेगा, शरीर तुम्हारा प्रेम बन जायेगा,
यहाँ तक कि तुम्हारा मोक्ष भी शरीर बन जायेगा।

जिन्होंने शरीर को खूब दबाया होता है, वो जब मोक्ष की भी कल्पना करते हैं,
तो यही सोचते हैं कि हम ऐसे ही कहीं और अवतरित हो जायेंगे।
“हमें मोक्ष मिल गया, अब हम ऐसे ही किसी और लोक में पहुँच जायेंगे, सशरीर।”

शरीर से मुक्ति चाहते हो, तो शरीर को ‘शरीर’ रहने दो।
जिन्हें शरीर से मुक्ति चाहिये हो, वो शरीर के दमन का प्रयास बिल्कुल न करें।
जिन्हें शरीर से ऊपर उठना हो, वो शरीर से दोस्ती करें।
शरीर से डरें नहीं, घबरायें नहीं।

शिष्य कौन?

जो दिन-प्रतिदिन की छोटी घटनाओं से नहीं सीख सकता वो किसी विशेष आयोजन से भी सीख पाएगा, इसकी संभावना बड़ी कम है|

बुद्धिमान वही है जो साधारणतया कही गयी बात को, एक सामान्य से शब्द को भी इतने ध्यान से सुने कि उससे सारे रहस्य खुल जाएँ |

सेवा से पहले स्वयं

स्व ही सब कुछ है | स्व जड़ है और सेवा फूल है | अब समझ में आ रही है बात ? स्व जड़ है और सेवा उस पेड़ का फूल है | सेवा वहीं होगी जिस पेड़ की जड़ें मज़बूत हैं | जो पेड़ स्वस्थ है उसी पर बड़े प्यारे फूल खिलते हैं | बहुत अच्छे फूल आते हैं | पर अगर तुम ये चाहो कि जड़ें तो सड़ी रहें पर फूल तब भी आ जायें, ऐसा हो सकता है क्या ?

स्व मूल है, सेवा फूल है | मूल मतलब जड़; स्व पर ध्यान दो, सेवा अपनेआप हो जायेगी | जो भी कोई तुम्हें बताये सेवा जरुरी है, मदद ज़रुरी है, सहायता, सेवा ज़रुरी है | उनसे कहना ऐसे सेवा नहीं हो सकती | बीमार आदमी सेवा नहीं कर सकता |

स्वस्थ मन कैसा?

एक चीनी गुरु थे, वो जंगल ले गये अपने शिष्यों को| वहाँ पर कुछ खड़े हुए पेड़ थे और कुछ कटे हुए पेड़ थे|

गुरु ने अपने शिष्यों से पूछा, “बताओ ज़रा कुछ पेड़ खड़े हुए क्यों हैं और कुछ पेड़ कटे हुए क्यों हैं?”

शिष्यों ने कहा, “जो काम के थे, वो कट गये और उनका उपयोग हो गया|”

गुरु ने पूछा, “और ये जो खड़े हुए हैं, ये कौन से हैं”? शिष्य बोले, “ये वो हैं, जो किसी के काम के नहीं थे|”

गुरु बोले, “बस ठीक है, समझ जाओ|”

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