कैसे बताएँ हमें हुआ क्या है

भक्त की दशा को इसीलिए बार-बार कबीर, ‘गूँगे के गुड़’ की दशा भी बोलते हैं। क्या होती है वो दशा? गूँगे के मुँह में है गुड़, अब उसे क्या अनुभव हो रहा है वो कैसे किसी को बताए। मिल तो गया है। तो भक्त का पाना कैसा होता है, वो इसको भी अभिव्यक्त नहीं कर सकता और भक्त का विरह कैसा होता है, वो इसको भी अभिव्यक्त नहीं कर पाएगा। भक्त कहे कि मुझे मिल गया है तो तुम पूछोगे क्या? तो वो क्या बताएगा कि क्या मिल गया है। भक्त कहे कि मुझे नहीं मिला और मैं तड़प रहा हूँ, तो तुम पूछोगे कि क्या नहीं मिला? वो कैसे बताएगा कि क्या नहीं मिला है। दोनों ही स्थितियों में बताए क्या?
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आप सब आमंत्रित हैं बोध सत्र में:

‘स्पिरिचुअल हीलिंग’- आचार्य प्रशांत द्वारा शब्द योग सत्र

दिनांक: बुधवार, 26.10.2016

स्थान: तीसरी मंजिल, G-39, सेक्टर-63, नॉएडा
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।
http://tinyurl.com/AcharyaPrashant-Gagan

इस शोषक समाज से मुक्ति कैसे पाएँ?

समाज आपको कोई हानि नहीं पहुँचा सकता अगर आप जागरूक हैं और अगर आप जागरूक नहीं हैं तो वो लोग जो आपके आस-पास हैं, भले ही उनके इरादे अच्छे हों आपकी बहुत ज़्यादा मदद नहीं कर पाएँगे। आपको अंत में हानि ही पहुँचेगी। आपको क्यूँ लगता है कि समाज एक अभिशाप है? आप में से कितने लोगों को समाज के बारे में कुछ समस्यात्मक लगता है? आप में से कितनों को कभी-कभी समाज के खिलाफ़ बगावत करने का मन करता है?
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25वां अद्वैत बोध शिविर, आचार्य प्रशांत के साथ 17-20 अक्टूबर तक आयोजित है।

आवेदन भेजने हेतु requests@prashantadvait.com पर ई-मेल करें।
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सम्पादकीय टिप्पणी:

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:
https://prashantadvait.com/books-in-hindi/

असत्य कुछ नहीं, सब आंशिक सत्य है

जैसे ही तुम कहते हो कि विचार अवास्तविक है, तुमने ये सोचा कि तुमने साथ में और भी क्या कह दिया है? जब तुम बोलते हो कि ये नकली है, तो तुमने क्या बोल दिया साथ में? ‘कुछ और’ असली है। मैं उसको कह रहा हूँ। मैं कह रहा हूँ – तुम जिसको असली भी बोलते हो, वो भी नकली ही है। तो सब ही वास्तविक है, तो अलग क्यों करते हो? सब एक ही वर्ग का है। चलो एक कदम और नीचे होगा उससे, क्या फ़र्क पड़ता है? एक ही घर के कई तलें हैं। पर है एक ही घर, उसको ये मत मान लेना कि तुम कहीं और चले गए, उसी घर में ही हो।

फ़ायदे का फ़ायदा क्या?

फ़ायदे का फ़ायदा क्या है?

तुम बचपन से ही तो फ़ायदे की तलाश में नहीं थे| तुम्हें ये किसने सिखाया कि फ़ायदा बड़ी बेहतरीन चीज़ है|

फँस गये?

जो ये फ़ायदा तुम खोज रहे हो, तुम्हें कैसे पता कि फ़ायदे का कुछ फ़ायदा होता है?

ये तुमने बस सुन लिया है| तुम्हारे चारों ओर एक समाज है जो फ़ायदे के पीछे भाग रहा है| घर में भी तुमने यही देखा है, तो तुम्हें लगता है कि फ़ायदा कोई बहुत अच्छी बात होगी|

तुम्हें कैसे पता कि फ़ायदा फ़ायदेमंद है?

अपने ऊपर भरोसा क्यों नहीं है?

बात सिर्फ़ आत्मविश्वास की नहीं है । ‘हमें विश्वास ही नहीं है । हमें किसी भी व्यक्ति पर, चीज़ पर, घटना पर, किसी भी बात के होने पर यकीन ही नहीं है । हमें यह भी ठीक-ठीक यकीन नहीं है कि हमारे पाँव-तले ज़मीन है कि नहीं है ।

यह सुनने में अतिश्योक्ति लगती है, पर बात ऐसी ही है । तुम जिन भी बातों पर बड़ा गहरा यकीन करते हो, कोई आकर, कुछ भारी और तीख़े तर्क देकर, उन सब यकीनों को हिला सकता है । तुम्हारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जो जड़ से उखाड़ा न जा सकता हो ।

स्वधर्म क्या है?

रूमी ने कहा है ना, “अपनेआप को साफ़ करो अपने ही पानी से”। गलो और तुम जब गलोगे तो उसी गलने में तुम्हारी सफाई है । जैसे कोई गन्दा स्नोबॉल हो, और वह पिघलता जा रहा हो और उसके पिघलने के कारण ही वह साफ़ होता जा रहा हो । तो देखो कि तुम क्या-क्या हो गये हो ? उसी से तुम स्वधर्म जान जाओगे । जो तुमने इकठ्ठा कर लिया है, जो भी तुम अपनेआप को समझते हो, वही बोझ है तुम्हारा । और तुम्हारा धर्म है ‘बोझ से मुक्ति’ । तुम्हारा धर्म है वापस लौटना । समझ रहे हो ?

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