सत्य और प्रेमिका में से किसे चुनूँ?

दुनिया में शान्ति सिर्फ़ एक तरीके से आ सकती है। वो तरीका तुम हो। तुम जितने मौन होते जाओगे, जितना तुम्हारे भीतर का शोर कम होता जाएगा, तुम पाओगे उतना ही बाहर के शोर को अब तुम कम पा रहे हो, बिना प्रयत्न किये। क्योंकि शोर तो गूँज की तरह होता है। उसे दीवार चाहिए। शोर कहीं से निकला, फिर उसे दीवार चाहिए, जो पलट करके उस शोर को वापिस ला दे। अगर खुले आकाश हो गए हो तुम, तो शोर फिर खो जाता है। तुम बंद कमरे में आवाजें करो, वहाँ शोर होता है। तुम खुले मैदान में आवाजें करो, तुम पते हो शोर कम होता है।
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आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम

1.) अद्वैत बोध शिविर
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2.) आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स
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3.) बोधसत्र का सीधा ऑनलाइन प्रसारण
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4.) आचार्य जी से निजी साक्षात्कार
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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जानकर यदि भूल गये तो कभी जाना ही नहीं

सौ साल भक्ति कर के यदि कोई फिसलता है, तो पक्का है कि भक्ति झूठी थी, इसी कारण फिसले। पर अगर कोई सौ साल नरक जैसा जीवन जी करके, एक दिन अचानक जग जाता है, तो ये मत समझ लेना कि जग इसलिए गया क्योंकी वो नरक जैसा जीवन जीया।

‘फिसलने’ के कारण होते हैं, ‘उठना’ कृपा होती है। कारण और कृपा में भेद करना सीख लो। ‘नरक’ के कारण होते हैं, ‘स्वर्ग’ कृपा होती है।
तो सौ साल भक्ति करके, अगर फिसल गए हो, तो कार्य कारण का सम्बन्ध चलेगा। तुम्हारा फिसलना इस बात का सबूत है कि पिछले सौ साल भी झूठे थे।
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भक्ति योग एवं पुरुषोत्तम योग आचार्य प्रशांत के साथ
6 मार्च से आरम्भ
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बाहरी प्रभावों से मन डगमगाता क्यों है?

दूर कहीं रोशनी है। वो जहाँ तुम खड़े हो, वहाँ हल्की सी दिखाई दे रही है, उसकी बस एक झलक मिल रही है। तुम उसकी तरफ़ दो तीन कदम बढ़ाओ तो क्या होगा? वो रोशनी थोड़ी और तेज़ होगी। चार कदम और बढ़ाओगे तो क्या होगा? वो रोशनी और तेज़ होगी। पर उसकी ओर कदम बढ़ाना होगा और जैसे-जैसे कदम बढ़ाते जाओगे, वैसे-वैसे तुम्हें यकीन होता जाएगा कि, ‘’हाँ रौशनी सच्ची है।‘’ पर उसकी ओर कदम तो बढ़ाओ। एक कदम से अगले कदम की ताकत मिलेगी। पहला जो कदम है, वो तो डरते-डरते ही रखना पड़ेगा क्योंकि रोशनी हल्की है, डरोगे। पहला जो कदम है, वो तो टटोल-टटोल के रखना पड़ेगा। लेकिन जैसे-जैसे कदम बढ़ाओगे, तुम पाओगे कि प्रकाश बढ़ता जा रहा है, तीव्र होता जा रहा है।
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आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 29 वां अद्वैत बोध शिविर आयोजित किया जा रहा है।
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश
तिथि: 24-27 फ़रवरी

अन्य जानकारी हेतू सम्पर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661

श्री कुंदन सिंह: +91 – 9999102998
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मृत्यु का स्मरण – अमरता की कुंजी

सब कुछ एक इंतज़ार है, एक अनवरत प्रतीक्षा है दुबारा वहीं समाहित हो जाने की, जहां से सब उद्भूत हुआ था। समय भी इसीलिये है। समय भी मात्र तभी तक है, जब तक, उसका उसके स्रोत से मिलन नहीं हो गया। जीवन भी इसीलिए है, क्योंकि उसका भी उसके स्रोत से मिलन नहीं हो गया है। सारे डर इसीलिए हैं, क्योंकि अभी, बिछड़े हैं, भटके हैं, केंद्र से दूर हैं। यही हमारी सारी बेचैनी का कारण है, यही हमारे सारे विचारों का कारण है, यही हमारी सारी तलाश, का उद्देश्य है। कहते उसे हम चाहे जो हों, नाम उसे हम चाहे जो भी देते हों, पर समय, संसार, विचार, सब सिर्फ़ इसीलिए हैं, ताकि वो किसी न किसी रूप में, हमें याद दिला सकें कि हमें जाना कहां है। हमें वापस मोड़ सकें, हमारी अंतर्यात्रा शुरू करा सकें।
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

https://href.li/?http://tinyurl.com/AcharyaPrashant-Gagan

मन – दुश्मन भी, दोस्त भी

मन का एक होना वो है, मन की एक सामग्री वो है, जो मन को उसके स्रोत से दूर करती है| और मन की एक दूसरी सामग्री वो है जो उसको स्रोत के निकट लेकर जाती है| ये आपके सामने कुछ पन्ने हैं, किताबें हैं |तो एक किताब हो सकती है जो मन को बहकाए और एक किताब हो सकती है जो मन को साध दे| स्रोत के पास ले जाए| हैं दोनों किताबें ही| हैं दोनों शब्द ही, किसी और का कहा हुआ शब्द है| दोनों ही किसी और के कहे हुए शब्द हैं| दोनो में ही कोई दूसरा मौजूद है| और दोनों की मौजूदगी में ही ज़मीन आसमान का अंतर है| एक है, जो आपको आपके करीब ले जा रहा है और एक है जो आपको आपसे ही दूर लेकर के जा रहा है और यही सूत्र है जीने का| यही कला है जीने की| कि क्या चुनें और क्या न चुनें| इसी का नाम विवेक है|
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

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शरीर का वास्तविक उपयोग

दृष्टि का अर्थ ये नहीं है कि तुमने बादलों को चीर कर के सूरज देख लिया। दृष्टि का अर्थ है कि बादल हैं ही नहीं, कहाँ हैं बादल? मात्र खुला आकाश है और कुछ है नहीं। बात आ रही है समझ में? इसी लिए साधुता, निर्मलता या दृष्टि विशेष होने का नाम नहीं है, वो और ज़्यादा सहज, सामान्य हो जाने का नाम है। उसका अर्थ है कि तुम पीछे आ गए, तुम केंद्र की तरफ आ गए, पीछे घर की तरफ आ गए। जो पूरी यहाँ व्यवस्था थी, स्वरचित, वो टूटी। कुछ नया नहीं आ गया है। साधु उसको मत मान लेना जिसके पास कुछ विशेष है, साधु वो है जिसके पास वो भी नहीं है, जो तुम्हारे पास है। समझो बात को और फिर यही बात उसकी बाहरी व्यवस्था में भी दिखाई देती है। भीतर से भी वो खाली है, उसके पास वो कुछ भी नहीं जो तुम्हारे पास है। तुम्हारे पास क्या है भीतर? तुम्हारे खौफ़ हैं, तुम्हारे सम्बन्ध हैं, तुम्हारे मोह हैं, तुम्हारे आकर्षण हैं, तुम्हारी आसक्तियाँ है। वो भीतर से खाली है, इन सब से और चूँकी वो भीतर से खाली है इन सब से, तो वो बाहर से भी उन सब चीज़ों से खाली हो जाता है जो तुम्हारे पास हैं।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

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