जैसे हो, वैसे आओ

जिसे शान्ति से बोलना है, वो शान्ति से बोले, बस ज़रा-सा होश रख ले कि शान्ति ही है ना? “कहीं ऐसा तो नहीं कि डर रहा हूँ? कि डर के मारे आवाज़ ऊँची नहीं कर पा रहा, इसलिए शान्त हूँ?”

जिसे ज़रा तुनक-मजाज़ी की आदत हो, लाल-पीला होकर बोलता हो, वो बेशक डांटकर बोले। लेकिन ज़रा जाँच ले, “ऐसा तो नहीं कि दूसरे पर हावी होना चाहता हूँ, इसलिए डांट रहा हूँ? ऐसा तो नहीं कि मेरी कोई व्यक्तिगत कुंठा है? कोई भड़ास निकाल रहा हूँ?”

जिन्हें नाचना पसंद हो, वो बेशक नाचें, खूब नाचें, पर ज़रा होश रखें। “कहीं ऐसा तो नहीं कि ध्यान से बचने के लिए यूँ ही उछल-कूद कर रहा हूँ? कि शान्त होकर ध्यान में ना बैठना पड़े, तो इसलिए नाचना-गाना शुरू कर दिया?”

जिन्हें शान्त होकर बैठना पसंद है, वो बेशक शान्त बैठें। पर ज़रा जाँच लें और जाँचने से मेरा अर्थ विचार नहीं है, ध्यान है। जरा जाँच लें कि कहीं ऐसा तो नहीं कि एक ढर्रा ही बन गया है कि नाचेंगे नहीं?

प्रेम – मीठे-कड़वे के परे

जानते हो लोग दुखी क्यों हैं? इसलिए नहीं कि दुःख आवश्यक है, इसलिए क्योंकि उन्हें सुख की तलाश है| सुख की तलाश, दुःख को स्थाई बना देती है| जो सुख को पकड़ता है, वो दुःख को भी पकड़ लेता है|

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