आप ही मूल आप ही शूल आप ही फूल

कुछ बँटा हुआ नहीं है, सब एक है। बँटा हुआ दिखता है, क्योंकि मन बँटा हुआ है। और जिस क्षण मन बँटा हुआ नहीं रहता, उस क्षण वो समय के पार देखने लगता है।

इसीलिए संतों को अक्सर भारत में ‘त्रिकाल-दर्शी’ कहा गया। ‘त्रिकाल-दर्शी’ का अर्थ यह नहीं है कि – वो यहाँ बैठे-बैठे भविष्य देख रहे हैं, घटनाएँ देख रहे हैं। ‘त्रिकाल-दर्शी’ का अर्थ यही है कि – वो बँटा हुआ नहीं देखते, वो समय के गुलाम नहीं हैं। वो बीज में पेड़ को, और पेड़ में बीज को, और दोनों में समष्टि को देखते हैं।

फूल-मूल की अभिव्यक्ति

आप जो कुछ भी कर रहे हैं, जैसे भी जी रहे हैं, उसमें क्या आपको कुछ भी ऐसा मिला है, जिस पर परायेपन की छाया न हो? या यह पूछ लीजिये अपनेआप से कि, “क्या मुझे संपूर्ण अकेलेपन का एक भी क्षण उपलब्ध होता है?” वही आपका अपना होता है। सुन्दर, पूर्ण अकेलापन। और वो अकेलापन जगत से भागने वाला नहीं होता है, वो अकेलापन आपकी अपनी पूर्णता का एहसास होता है। जहाँ भी दूसरा मौजूद है, वहीँ आपकी अपूर्णता मौजूद है। नहीं तो दूसरे के लिए जगह कैसे बनती।

और यदि मन और विचारों की भाषा में बात करनी हो, तो पूछ लीजिये अपने आप से कि, “क्या दिन भर में कोई भी क्षण ऐसा उपलब्ध होता है, जब मन पर विचार हावी न हों?” आप कहेंगे, “विचारों का आना-जाना तो चलता ही रहता है, प्रवाह है”। तो मैं कहूँगा, “ठीक, विचारों का आना-जाना तो चलता रहे, तो इतना ही बता दीजिये कि ज़रा भी अवकाश आपको ऐसा उपलब्ध होता है, जब आप विचारों से अनछुए रहें। ठीक, विचारों का आना-जाना चलता रहता है। क्या कभी ऐसा होता है कि आप विचारों से अनछुए रहें?”

प्रयत्न किसके लिए?

यत्न में हम सब उद्यत रहते हैं। हमारे सारे यत्न भूलने से उपजते हैं। विस्मृत कर देते हैं कि हम हैं कौन, क्या हमारा स्वभाव है और क्या हमें उपलब्ध ही है। ज्यों ये भूले कि मैं कौन और क्या मुझे मिला ही हुआ है, त्यों ही ये हसरत जगती है कि उसको हासिल करूँ जो खोया-खोया सा लगता है।

खोने और भूलने में फर्क है। तुम बिना खोये भी ये भूल सकते हो कि कुछ तुम्हारे पास है। तुम अपनेआप को खोये बिना भी अपनी पहचान बिल्कुल भूल सकते हो और भूलने का तुरंत परिणाम होता है- खोजने की कोशिश। “खो गया है – खोजो। मिट गया है – हासिल करो।”

तो यत्न में हम रत रहते हैं। भूलने का परिणाम है, यत्न। भूले, और हासिल करने निकल पड़े। ये हमारा आम संसारी है, जो हासिल करने की दौड़ में लगा हुआ है।

मेरा असली स्वभाव क्या है?

कुत्रापि खेद: कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।  मन: कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थित: सुखम्।।  ~ अष्टावक्र गीता(१३.२)  अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ है, वाणी के दुःख भी

अवलोकन और ध्यान में अंतर

हमारे जीवन में यदि उर्जा का अभाव है, यदि हम जो कुछ भी करते हैं उसमे संशय बना रहता है, तो स्पष्ट है कि जीवन में स्पष्टता नहीं है, निजता नहीं हैI कारण – जीवन में ‘अवलोकन’ नहीं हैI अवलोकन किसी भी चीज को स्पष्ट रूप से देखना है – बिना धारणाओं के हस्तक्षेप के – यानि ध्यान की पृष्ठभूमि में देखना है, और ये उर्जा का अनंत स्रोत हैI ये बिखरी हुई, अस्पष्ट, दिशाहीन उर्जा नहीं है, बल्कि केन्द्रित है, एक नुकीली तीर की तरह, जिसे स्पष्ट पता है कि उचित कर्म क्या हैI

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