मैं बेक़ैद, मैं बेक़ैद

आपकी बातो में कुछ नया ही नहीं है। आप जो बोल रहे हैं, वो सब पहले ही उपनिषदों में लिखा हुआ है। आपके बस शब्द अलग हैं, आपके कहने का तरीका अलग है, वरना आप कोई नयी बात नहीं बोल रहे हैं। तो पीछे खड़ा था, वो हँसने लग गया, तो वो बोलता है, कोई नयी बात अगर ये बोल रहे होते तो क्या ये बुद्ध होते? 

जो भी कभी बोलेगा वो यही बोलेगा जो सदा से नित्य का, बिलकुल ठीक, नित्य का अर्थ ही यही है। हाँ, अंदाज़ समय के अनुकूल होगा।

वो अनुभव से निकलेगा। शब्द, भाषा, अंदाज़, ये समय, वातावरण, माहौल, सुनने वाले, कहने वाले, इसके अनुसार होंगे। लेकिन जो बात है, जो महीनतम, सूक्ष्तम बात है, वो तो वही होनी है। और इसमें बड़ा मज़ा है। कि जब कहीं से चले और देखा कि वहीं पहुँच गए। कहीं से चले, और पहुँच कहाँ गए?

आचार्य प्रशांत
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निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998
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जितना सर को झुकाओगे उतने शांत होते जाओगे

अब या तो टीवी के सामने झुक लो, विज्ञापनों के सामने झुक लो, कार्टून बनाने वाले हिंसक लोगों के सामने झुक लो, या सुबह उठते ही देव मूर्ति के सामने झुक लो, किताबों के सामने झुक लो, गुरु के सामने झुक लो| झुकना तो तुम्हें है ही| इस अकड़ में मत रहना कि अगर गुरु के सामने सर नहीं झुकाएँगे तो झुके नहीं, झुके तो तुम हो ही क्योंकि मन के अपने पाँव नहीं होते, मन हमेशा तो सहारा लेकर चलता ही है, लेकिन सवाल ये है किसका सहारा? या तो उसका (परमात्मा) सहारा ले लो नहीं तो फिर दुनिया में जितना लीचड़पना है तुम्हे उस का सहारा लेना पड़ेगा, सहारा तो लेना ही है|

आचार्य प्रशांत
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आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661

आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)

आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240

जागृति माह

जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का हिस्सा बन सकते हैं।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

सम्पर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

महत्वपूर्ण है महत्वपूर्ण को याद रखना

फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारे लिए क्या महत्वपूर्ण है और किस बारे में गंभीर हो? यही बुरा है कि किसी बारे में तो गंभीर हो गए न।
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अष्टावक्र-जनक महासंवाद
आचार्य प्रशांत के साथ 6 अप्रैल से

आवेदन भेजने हेतु: requests@prashantadvait.com पर ईमेल करें
या संपर्क करें: +91-9818591240
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

गगन घटा गहरानी रे

जब कबीर खेत की बात कर रहे हैं, तो वहाँ पर कृष्ण का ध्यान आ जाना स्वभाविक है, जहाँ उन्होंने क्षेत्र-क्षेत्र के विभाग वियोग में यही बात की है। कबीर ने खेत की और अवधूत की छवि ली है, और करीब-करीब ये ही कृष्ण ने भी ली है। तुम क्षेत्रज्ञ हो, और संसार तुम्हारा क्षेत्र है। वही यहाँ पर कबीर छवि उठा रहे हैं। जो अच्छा किसान होता है, वो अपनी फसल कांट करके घर ला पाता है। और जो नहीं होता, लापरवाह होता है, उसका यही होता है कि कभी पानी, वर्षा उसका खेत तबाह करती है, कभी जानवर आकर के उसका खेत चर जाते हैं। अंततः उसके हाथ कुछ नहीं लगता। वो यही पाता है कि जन्म वृथा गंवाया। ‘जन्म वृथा गंवाया।’ फसल हो सकती थी, लाभ हो सकता था, परम की प्राप्ति उसको हो सकती थी, पर हुआ कुछ नहीं। मेहनत भी करी, पर लापरवाही खूब रही, बोध नहीं रहा। चार जो रखवाले थे, वो उसको उपलब्ध नहीं थे, या जो उसने उसमें फसल बोई, वो “नाम” की धानी नहीं थी, उसने कुछ और ही बो दिया उसमें। इधर- उधर की झाड़ , पतवार बो दी। तो अंततः कोई लाभ नहीं मिला।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
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सुरति माने क्या?

कोई भी विधि तुम्हारी अनुमति के बिना काम नहीं करेगी। विधियाँ दी जा सकती हैं पर विधि को काम करने की अनुमति तो तुम्हें ही देनी है न। तुम मंदिर में बैठे हो पर दिल तुम्हारा अभी अटका ही हुआ है दुकान में और मकान में तो तुमने अपने आप को अभी अनुमति ही नहीं दी है कि यह विधि तुम्हें फायदा दे। विधि की कोई गलती नहीं है। जिन्होंने विधियाँ बनाई उन्होंने ठीक-ठाक बनाईं पर विधि तुम पर काम करे कैसे? और अगर तुम पूर्ण अनुमति दे दो तो फिर विधि की ज़रूरत भी नहीं है। अनुमति जितनी खुली होती जाएगी विधि की आवश्यकता उतनी कम होती जाएगी।

बाहरी बदलाव क्यों ज़रूरी हैं?

हम जैसा जीवन जी रहे हैं, वैसा ही जीते रहें, और साथ ही साथ, उलझनों से मुक्त हो जाएँ, सत्य के समीप भी आ जाएँ, जीवन को समझ जाएँ, मूर्ख जैसे न रह जाएँ, बोध हममें जगे – ये असंभव है ।

जो अपने जीवन को बाहर से बदलने से रोकेगा, उसका आतंरिक विकास भी बाधित हो जाएगा ।

~श्री प्रशांत

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