मन जिसका विरोध करता है, उसी का नाम दुःख रखता है

दुःख दिक्क़त तब देता है, जब उसका विरोध करो।
सुख भी नर्क तब बन जाता है, जब उसकी इच्छा करो।
दुःख को यदि विरोध आप न दें, तो क्या वो वास्तव में कोई गड़बड़ बात होगी?

दुःख, ‘दुःख’ क्यों है? क्योंकि आपके भीतर कोई है, जो उसे नहीं चाहता।
जब मैं कह रहा हूँ कि दुःख को गहराई से अनुभव करो, तो मैं कह रहा हूँ कि उसका विरोध करो ही मत।

वो जो भीतर बैठा है, जो दुःख को रोकता है और सुख को आमंत्रित करता है, उसको हटाओ।

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