सोचो ज़रूर पर सोचते ही मत रह जाओ|

भौतिकता का अर्थ है कि “अगर तुम हमसे आ कर कहोगे कि कुछ ऐसा है जिसका विचार नहीं किया जा सकता तो हम कहेंगे वो

भौतिकता क्या है?

भौतिकता का अर्थ है कि “अगर तुम हमसे आ कर कहोगे कि कुछ ऐसा है जिसका विचार नहीं किया जा सकता तो हम कहेंगे वो है ही नहीं|” भौतिकता का अर्थ फिर समझो, भौतिकता माने “जो भी कुछ है वो इन्द्रियगत है| हम सिर्फ भूतों को”, भूत माने क्या? भूत माने वो जो इन्द्रियों से परिलक्षित होता हो, “हम सिर्फ भूतों को मान्यता देते हैं| यानि कि हम सिर्फ मन और इन्द्रियों को मान्यता देते हैं, हम और किसी और सत्ता को मान्यता देते ही नहीं|”

~ आचार्य प्रशांत

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निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-
१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:
अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks
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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.comपर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

नया जीवन धीरे धीरे आता है, या एक छलाँग में?

तो, जितना जाना है, वो कर्म में आने दो, उसको कहते हैं “टेक अ प्लंज”| उसको रोको मत, जो बात समझ में आ गई है अब वो जीवन में दिखाई देनी चाहिए, उसके सामने मत खड़े हो जाओ, यह हुआ “टेक अ प्लंज”| और जहाँ कह रहा हूँ कि “फर्स्ट अंडरस्टैंड (पहले समझो)” वहाँ मैं कह रहा हूँ कि उतने ही कर्म करो जितना समझ में आ गया है| पौधा सिर्फ उतना ही हो जितना जड़ से सीधे-सीधे निकल रहा है, नकली मत लगा दो उस पर|

पहली बात यह है कि जड़ से पौधे को निकलने दो और दूसरी बात यह है कि पौधा बस उतना ही रहे जितना जड़ से निकला है, उसके ऊपर नकली मत लगाओ| न तो उसके ऊपर कोई नकली पौधा आरोपित कर दो और न तो उसे खींचने की कोशिश करो, कि अरे अभी थोड़ा ही सा निकला तो चलो और खींचते हैं, तो जितना निकला भी है वह भी मर जाएगा|

तो यह दोनों बातें हैं, दोनों एक साथ हैं| दोनों अलग-अलग नहीं है, दोनों विरोधी नहीं है एक दूसरे की, दोनों एक साथ हैं|

~आचार्य प्रशांत
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आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

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संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661

आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)

आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

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जागृति माह

जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का हिस्सा बन सकते हैं।

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आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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योग है अपनी बेड़ियों को अपनी ही ज्वाला में गलाना

हम में से अधिकांश जीवन को आदतों के पीछे से देखते हैं। हम जीवन से इतने एक हो चुके होते हैं, इतने अभ्यस्त हो चुके होते हैं कि जो भी चल रहा होता है, हमें सहज ही लगता है। कुछ भी हमें चौंकाता नहीं है। जो भी हमारे सामने आता है, हम कहते हैं, ऐसा ही तो होता है, यही तो जीवन है; दुनिया ऐसी ही तो है, संसार ऐसे ही तो चला है और चलेगा। हम में किसी प्रकार का विरोध उठना तो छोड़िये, सवाल भी नहीं उठता। बोध तो छोड़िये, जिज्ञासा भी नहीं उठती। हम बस स्वीकार किये जाते हैं और ये स्वीकार, अप्रतिरोध नहीं है। क्योंकि जो स्वतंत्र चैतन्य प्रतिरोध कर सके, वो हमारे पास होता ही नहीं है। जो मन, होनी पर सवाल उठा सके, वो मन हमने कहीं दबा दिया होता है। तो निष्पत्ति ये होती है कि खौफ़नाक से खौफ़नाक मंज़र भी हमें साधारण लगता है। और साधारण वैसे नहीं लगता जैसा किसी ज्ञानी को लगे, साधारण ऐसे लगता है कि, खौफ़ तो जीने का तरीका है ही ना। इसी को तो जीवन बोलते हैं, तो अचम्भा कैसा?
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खेल के जारी रहने में मज़ा है और काम के खत्म हो जाने में

खेल वो होता है, जो दो बच्चे खेलते हैं आपस में। वहाँ ये कोशिश नहीं की जाती कि जल्दी से जल्दी जीत लूँ और खेल ख़त्म हो जाए। वहाँ तो प्रेम में खेला जाता है और कहा जाता है कि ऐसा खेलो कि खेलते ही रहो। ये नहीं कहा जाता कि, “अरे वाह! पंद्रह अंक बनाने थे जीतने के लिए। मैंने पहले बना लिए। खेल ख़त्म।” न! तो बड़े जो खेल खेलते हैं, और बच्चे जो खेल खेलते हैं, उसमें ज़मीन-आसमान का अंतर है। बड़े जो खेल खेलते भी हैं, वो खेल नहीं है। वो खेल भी हमारे प्रतियोगी मन से निकला है। वो हिंसा है एक प्रकार की। वो अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का उपाय है।
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मुझे इतनी ठोकरें क्यों लगती हैं?

दुनिया के लिए अमर होने का अर्थ है: समय का लम्बा खिंच जाना और सत्य में अमरता का अर्थ है: समय का विलुप्त हो जाना क्यूंकि समय कितना लम्बा भी खिंचे, उसकी लम्बाई को आप एक संख्या में बाँध सकते हैं, एक संख्या द्वारा व्यक्त कर सकते हैं। दुनिया में जो कुछ भी बड़े से बड़ा होगा, वो दुनिया के तल पर ही होगा। बडे से बड़ा, होगा दुनिया के तल पर और जो कुछ भी दुनिया के तल पर है, उसमें आखिरी बिंदु ज़रूर आएगा इसीलिए वो वास्तव में बड़ा हो नहीं सकता। सत्य में वो सब कुछ क्षुद्र, नगण्य और भ्रम बराबर ही है, जो ख़त्म हो जाता है।

सत्य में है ही वही, जिसकी न कोई शुरुआत हो, न कोई अंत हो।
तुम कैसा जीवन जी रहे हो, जानने के लिए बस ये परख लेना, क्या कुछ है तुम्हारे पास ऐसा, जो समय से बच निकलेगा? क्या है तुम्हारे पास ऐसा, जो मौत से बच निकलेगा? क्या है तुम्हारे पास कुछ ऐसा, जो तुम्हारे पास दुनिया में आने से पहले भी था? कुछ भी ऐसा है तुम्हारे पास, जो तुम्हें दुनिया ने न दिया हो, कुछ ऐसा पा लो, बस वही सत्य है; बाकी सब बस प्रतीति होता है।
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अष्टावक्र-जनक महासंवाद
आचार्य प्रशांत के साथ 6 अप्रैल से

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