सत्य के लिए साहस नहीं सहजता चाहिए

सत्य का मार्ग अति सहज है, उसमें साहस चाहिए ही नहीं।

साहस और डर तो द्वैत युग में है। ये इकट्ठे चलते हैं — जहाँ डर है वहीं साहस की मांग है। और सत्य में कहीं डर होता नहीं। किसी को अगर डर लग रहा है, वह साहस की मांग कर रहा है, इसका अर्थ एक ही है, क्या? कि उसको जो भी विचार आ रहा है वो निरर्थक ही है। और विचार अधिकांशत: निर्थक होते ही हैं।

कोई साहस नहीं चाहिए। जितना अपनेआप से ये कहोगे कि मुश्किल है रास्ता, उतना तुम अपनेआप को यकीन दिला रहे हो कि मुझे चलने की ज़रूरत नहीं। मैं चल ही नहीं पाऊंगा, मेरे बूते से बाहर की बात है, अति कठिन है रास्ता।

हमारे रिश्तों की वास्तविकता

जो कुछ भी जन्म से आया है, जो कुछ भी जीवन में मिला है, वो तो चला ही जाना है। इनके आने और जाने को अगर परख लिया, तब तो सत्य फिर भी परिलक्षित हो सकता है, लेकिन ये स्वयं सत्य नहीं बता पाएँगे। जो कुछ भी आया है वो तो खुद द्वैत में है। वो कैसे अद्वैत का पता देगा?

परिपक्वता क्या है?

प्रश्न: सर, परिपक्वता क्या है? वक्ता: (१८-२२ वर्ष की आयु के विद्यार्थियों की सभा को संबोधित करते हुए) यह शब्द ‘परिपक्वता’ हम सभी को अपने लिए महत्वपूर्ण

निम्न विचार और उच्च विचार क्या?

प्रश्न: निम्न विचार और उच्च विचार क्या हैं? वक्ता: हम में से कितने लोगों को ये सवाल अपने सन्दर्भ में उचित लग रहा है? कितने लोगों

संसारी कौन? जो संसार से पूर्णतया अज्ञानी हो

तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः। त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन॥ -अष्टावक्र गीता (१५.१६) अनुवाद: अज्ञानवश तुम ही यह विश्व हो पर, ज्ञान दृष्टि से देखने

चलना काफी है

आपने ऐसे लोग देखे होंगे जो बोलते हैं, खूब बोलते हैं, और मौन आते ही असहज हो जाते हैं, बड़े बेचैन से हो जाते हैं। अगर वो आपके साथ बैठे हैं, और बीच में एक मिनट का भी मौन आ जाए, तो इनके लिए मौन झेल पाना बड़ा मुश्किल होता है। क्योकि, शब्दों में हमारा झूट छिपा रहता है। मौन मे तो मन का सारा तथ्य उद्घाटिक होने लगता है। मौन नहीं झेल पाएंगे।

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