अपनी निजता क्यों खो देते हो?

हमारे दिमाग ऐसे ही हैं। उन पर निशान बहुत जल्दी पड़ जाते हैं। जैसे कि एक धातु की पट्टी हो। उसको आप एक बार मोड़ दो और फिर छोड़ो। तो क्या होता है? तुमने एक लोहे की पट्टी ली और उसकी मोड़ दिया। फिर छोड़ोगे तो क्या होगा? वो वैसी ही रहेगी जैसा कर दिया है। ये कहलाती है दिमाग की प्लास्टिसिटी। एक बार मन पर एक प्रभाव पड़ गया, तो वो मन को गन्दा कर के जाएगा। वो मन पर एक तरीके का निशान छोड़ करके जाएगा। वो एक प्रभाव पर से गुज़रा और वो हमेशा के लिए प्रभावित हो गया। हमेशा के लिए।
दूसरी ओर लचीला दिमाग होता है। वो एक स्वस्थ दिमाग होता है। जो प्रभावों से गुज़र जाता है लेकिन रहता साफ़ है। उस पर कोई निशान हमेशा के लिए पड़ नहीं पाता। उसकी कंडीशनिंग नहीं हो पाती।
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समस्याओं का सामना कैसे करें?

मन ऐसा तैयार करो कि वो हर स्थिति को देख ले; पूरा देखले; पार देखले। और फिर कहीं से भागेगा नहीं वो। वो सामना ही करता है। कुछ पड़ा नहीं रहने देता। तो तुम तैयार करो, साफ़ रखो। उसके बाद एक अद्भुत घटना और भी घट सकती है। वो ये कि तुम्हें किसी परिस्थिति को हल करना ही न पड़े। तुम्हारी आहट भर से परिस्थिति खुद हल हो जाए। तुम्हारी आहट भर से परिस्थिति खुद हल हो जाए। तुम्हारे आस पास समस्याएं, माया भटके ही न। नज़र तुम्हारी इतनी तेज़ हो कि देखने भर से जितना अज्ञान है, सब घुल जाए। तुम जिस कमरे में बैठे हो, अपनेआप वहाँ का माहौल ऐसा हो जाए कि अब यहाँ कोई टुच्ची बात हो ही नहीं सकती। तुम जिस घर में हो, उस घर की तबियत बदल जाए। वो सब अपनेआप होने लगेगा।
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अभी और कितना सहारा चाहिए तुम्हें?

जिस स्मृति से धोखा खाते हो, वो स्मृति भी किसने दी है? जिस माया के कारण ‘उसको’ भूलते हो, वो माया भी उसी की है। तो अब और क्या माँग रहे हो?

‘वो’ अपने होने पर भी है और अपने न होने पर भी है। तो अब और क्या माँग रहे हो? जब सत्य है, तब तो सत्य है ही, जब सत्य नहीं है, तो माया है। और माया क्या है? माया भी तो सत्य का ही रूप है। छाया है सत्य की। ‘वो’ अपने होने में भी है, ‘वो’ अपने न होने में भी है; अब प्रार्थना क्या कर रहे हो, माँग किस चीज़ की है? या तो मिलेगा या तो नहीं मिलेगा। मिला तो मिला, नहीं मिला तो भी मिला। जीते तो जीते, हारे तो भी जीते। कृष्ण कहते हैं अर्जुन से कि, “या तो मुझे पाएगा, नहीं तो मेरी माया में फंस जाएगा। दोनों ही स्थितियों में हूँ तो मैं ही।”
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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गहराई अस्पर्शित रहे स्थितियों के संघात से, सागर बिखर नहीं जाता हवाओं के आघात से

मैं कह ही नहीं रहा हूँ कि जीवन आसन हो जाए, क्यों?

क्योंकि कठनाईयाँ मुझे तोड़ सकती नहीं।

मैं जो हूँ, जो सत है मेरा, वो तो अकंप रहना है, अनछुआ रहना है।

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