साक्षित्व का वास्तविक अर्थ || आचार्य प्रशांत (2019)

साक्षित्व अपनेआप में कोई दशा नहीं होती।

साक्षित्व समस्त दशाओं की निस्सारता से परिचित होने का नाम है।  

साक्षित्व अगर अपनेआप में कोई दशा होती, तो फ़िर उस दशा का भी कोई और साक्षी होता न ।

साक्षित्व समस्त दशाओं से मुक्ति का नाम है।

आचार्य प्रशांत: ये बनना, बिगड़ना, और बदलते रहना

जीवन का नाम ही है – बदलना, बिगड़ना, बनना, सब पुनः-पुनः। आप इस चक्र में कहाँ सम्मिलित हो रहे हैं? आपका इसमें प्रयोजन क्या है? 

आप कहीं और हैं, आप वहीं रहिए। आप इस सब के द्रष्टा और साक्षी भी होने का प्रयास मत करिए। दिख गया तो दिख गया, नहीं दिखा तो कोई बात नहीं। कुछ बहुत अच्छा आपको मिल नहीं जाना है बहुत टूट जाए तो। और कुछ आपका छिन नहीं जाना है, अगर संसार बनता ही रहे तल-दर- तल, परत-दर-परत, मंज़िल-दर-मंज़िल। तो भी

कोई दिन ऐसा नहीं था जब ये खेल चल नहीं रहा था, और कोई दिन ऐसा नहीं होगा जब ये खेल चल नहीं रहा होगा।

तिनका कबहुँ न निंदिये

तिनका, तिनका है ही नहीं। तिनके को तिनका बनाया किसने? देखने वाली आँख ने। किसने कह दिया कि तिनका, तिनका है? तो, जब कबीर कह रहें हैं कि ‘तिनका कबहूँ न निंदिये’ तो शुरुआत यहाँ से मत कीजिये कि छोटी से छोटी चीज़ की भी उपेक्षा मत कीजिये, अक्सर इसी रूप में इसका अर्थ किया जाता है कि जब कबीर कहें कि ‘तिनका कबहूँ न निंदिये’ तो कबीर कह रहें हैं कि जो लघु है, जो छोटा है या जो उपेक्षनीय है, उसको भी इज्ज़त दीजिये – नहीं कबीर ये नहीं कह रहे हैं। कबीर कह रहें हैं कि कुछ भी छोटा है ही नहीं।

इसका ये अर्थ नहीं है कि कबीर कह रहें कि सब कुछ बड़ा है। कबीर कह रहें हैं कि न कुछ छोटा है, न कुछ बड़ा है, सब बस वही एक है जिसे तुम छोटा कहो तो बेवकूफी की बात है, परन्तु यदि उसे विराट कहो तो उतनी ही बेवकूफी की बात है। क्योंकि छोटा कहना या विराट कहना दोनों ही नापने तौलने वाली बातें हैं, और यह अहंकार का कर्तापन है कि नाप लो, तौल लो, कोई सीमा दे दो, ताकि तुम्हारे मन मैं समा सके; परिभाषित कर दो, नाम दे दो।

‘तिनका कबहूँ न निंदिये’ क्योंकि तिनका वही है, तुम्हें दिखाई नहीं दे रहा। तुम्हें दिखाई इसीलिए नहीं दे रहा है क्योंकि तुम उसे साक्षी होके देख नहीँ पा रहे। तिनके को देखते हो अपने अहंकार के केंद्र से, और अहंकार मुर्दा होता है, बोध नहीं होता है उसके पास। अहंकार तिनके को ऐसे ही देखेगा जैसे समय ने उसे सिखाया है, जैसा परिस्थितियों ने उसे सिखाया है। कोई यदि ऐसी सभ्यता हो जिसमें तिनकों की पूजा की जाती हो तो वहाँ आप पाएँगे कि वहाँ तिनका निंदिये तो छोड़िये, तिनकों को मंदिर मैं बैठाया जाता है, तिनकों की आरती उतारी जाती है, क्योंकि तिनका तिनका है ही नहीं।

आचार्य प्रशांत
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निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

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फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

 मन को देखना मग्नता

श्रोता:  ‘सविकल्प समाधि’ में कोई एक विचार रह जाता है?

आचार्य प्रशांत: नहीं, एक विचार नहीं। देखो, यह सब भाषा की बातें हैं| एक विचार रह सकता है कभी? अगर मात्र एक हो, तो क्या तुम एक को भी जान पाओगे? तुम एक को जान ही तभी सकते हो जब एक से ज्यादा हों।

तुम स्पेस  में हो, और स्पेस में सिर्फ एक है, स्पेस। क्या तुम जान पाओगे कि यह स्पेस  है? और कोई मापदंड ही नहीं है उसको स्पेस  बोलने के लिए। एक को तभी जाना जा सकता है जब एक से ज्यादा हों। तो सविकल्प समाधि में यह कहना कि एक रह जाता है, कहने की बात है। विकल्प का मतलब ही है ‘दो’।
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आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

अद्वैत बोध शिविर
हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा:  +91 – 8376055661

  आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)
आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

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 संपर्क करें: श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240

   जागृति माह
   जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का हिस्सा बन सकते हैं।

    आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर या

सम्पर्क करें: सुश्री अनुष्का जैन: +91 9818585917

 आचार्य जी से निजी साक्षात्कार
आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न:  http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
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इच्छा अपूर्ण, मौज पूर्ण

ध्यान के अभाव में ही तो भ्रम रहता है न? ध्यान है फिर कहाँ कोई पर्दा है? इसीलिए पूछना बहुत ज़रूरी होता है कि ये बात कह कौन रहा है? पर्दा नहीं है, पर्दे के भीतर जो संसार है वही सत्य है, ये कौन कह रहा है? ये दृष्टा कह रहा है। ‘’पर्दा है, और मैं पर्दे से बाहर हूँ, देख मात्र रहा हूँ,’’ ये कौन कह रहा है? ये साक्षी कह रहा है। न दृष्टा सत्य है, न साक्षी सत्य है। कहने में ऐसा लगता है कि जैसे साक्षी मन को देख रहा हो पर भूलियेगा नहीं कि साक्षी भी मन की कल्पना ही है।
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आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम

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साक्षित्व माने क्या?

जब भी कभी कुछ खिलवाड़ में होता है, कुछ पाने की अभीप्सा से नहीं होता है, तो वही नृत्य बन जाता है; और जब भी कभी कुछ भी मानसिक गतिविधि के चलते होता है, कुछ पाने के लिए, कहीं पहुँचने के लिए, तो वो दौड़ बन जाता है।
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