बुरे की क्या परिभाषा है तुम्हारी? ||आचार्य प्रशांत (2016)

जब आनंद आता है, तो उसका रुप कष्ट का होता है।

नतीजा ये होता है कि हम उसे ठुकरा देते हैं। जब मुक्ति आती है तो अपने साथ बंधनों को तोड़ती है। बंधनों को हमने नाम दे रखा है ‘जीवन’ का। मुक्ति आती है तो जीवन टूटता-सा प्रतीत होता है। अब टूट-वूट कुछ नहीं रहा है, कुछ बिगड़ नहीं रहा है, कुछ बुरा नहीं हो रहा है, जो हो रहा है बहुत सुंदर हो रहा है।

कभी पलट के प्रश्न तो कीजिए ‘मुझे कैसे पता कि अब जो हो रहा है वो गलत ही है?’

निश्चितरूप से अपने जीवन को दूसरों की दृष्टि से देख रहे हो।

कहते हैं कबीर ‘जो घर ज़ारे आपना वो चले हमारे साथ’, अब घर जल रहा है कबीर साहब का, घर प्रतीक है वैसे ही समझिएगा, घर जल रहा है कबीर साहब का, कबीर साहब हँस सकते हैं, पड़ोसी क्या कहेंगे?

बेचारा अभागा!

अब अगर पड़ोसियों से पूरी तरह मुक्त नहीं हुए हो तो तुम्हें भी यही लगने लग सकता है कि तुम अभागे हो क्योंकि जब घर जलेगा तो पड़ोसी तो यही कहेंगे, ‘बेचारा अभागा!’

और तुम्हें भी लगेगा कि कुछ बिगड़ गया। जो कबीर है उसे फिर पूर्णतया कबीर हो जाना चाहिए। अधूरा कबीर होना वैसा ही है, जैसा घोड़े से अधूरा उतरना। वहाँ नाहक कष्ट है, या तो पूरे रहो या फिर तुम घोड़े पर ही बैठे रहो।

घोड़ा खुद हीं थोड़े देर में (गिरा देगा)।

जो उतर रहे हों उनसे यही निवेदन है कि पूरा उतरें।

क्या बड़ों का सुझाव हमेशा सही होता है? || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2014)

एक आदमी, आधे चित्त का है, कभी यहाँ है कभी वहाँ है, दो मिनट को यहाँ रहता है फिर कूद करके वो बाहर पहुँच जाता है, शरीर यहीं है, मन बाहर पहुँच गया, मन चाँद पर बैठा हुआ है, शहर घूम रहा है, चाट खा रहा है, पिक्चर देख रहा है; वो बता पायेगा बातों में दम था कि नहीं?

वो कुछ बोलेगा ज़रूर क्योंकि उसने थोड़ा कुछ सुना है, पर वो जो कुछ भी बोलेगा उल्टा ही होगा, अर्थ का अनर्थ करेगा।

जिसने आधी ही बात सुनी, वो और ज़्यादा खतरनाक है, सोए हुए से ज़्यादा खतरनाक है क्योंकि वो अर्थ का अनर्थ करेगा, वो कहेगा,’नहीं! मैं था, मैं जगा हुआ था’। सोए हुए में कम-से-कम ये अकड़ तो नहीं आएगी, वो कहेगा, ‘भाई! मैंने तो कुछ सुना ही नहीं, मैं सोया हुआ था’।

ये जो अध-जगे होते हैं, ये बहुत खतरनाक हो जाते हैं क्योंकि इनका दावा होता है कि हम तो जगे थे। और जगे ये थे नहीं, समझ में इन्हें कुछ आया नहीं। समझ में किसे आएगा? कौन है जो साफ-साफ देख पाएगा कि बात में दम है कि नहीं, सलाह मानने लायक है कि नहीं? कौन कह पाएगा?

जो जगा हुआ है।

तो बस यही उत्तर है।

‘ना’ बोलने में झिझक || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2014)

‘ना’ तो हम बोलते हैं, वहाँ हमारा गणित होता है। हमे अच्छे से पता है कहाँ ‘हाँ’ बोलनी है और किस सीमा के बाद ‘ना’ बोल देना है। ऐसा नहीं है कि हम ‘ना’ नहीं बोल पाते। तुम्हारा सवाल यह नहीं होना चाहिए कि मैं ‘ना’ नहीं बोल पाता, तुम्हारा सवाल ये होना चाहिए कि मेरा ये गणित कैसा है जो मुझे दुःख देता है?

तुम्हारी ‘हाँ’ और ‘ना’ ठीक नहीं बैठ रही यह है तुम्हारा सवाल। तुम ‘ना’ भी बोलते हो तुम ‘हाँ’ भी बोलते हो, बोलते तो तुम दोनों ही हो मगर जहाँ ‘ना’ बोलनी चाहिए वहाँ ‘हाँ’ बोल आते हो, जहाँ ‘हाँ’ बोलनी चाहिए वहाँ ‘ना’ बोल आते हो!

आमतौर पर हम ‘हाँ’ उस बात को बोलेंगे, उस व्यक्ति को बोलेंगे, उस घटना को बोलेंगे जो हमे हमारे जैसा बनाये रखती है। अपने जैसा बने रहने में हमने सुविधा बना ली है।

आचार्य प्रशांत: गलत जगह ढूंढ रहे सुख को

मन को लेकिन उम्मीद बाकी है अगर तुमने भेजा है मन को तो तुम उसे खीच भी सकते हो। मालिक तुम ही हो, तुम्हीं ने रवाना किया है तो तुम ही वापस बुला सकता हो। उसके लिए तुम्हें अपनी मान्यताएँ बदलनी होगी, उसके लिए तुम्हें पहले ये सोचना छोड़ना होगा की दुनिया इसीलिए है ताकि इसे खूब भोगो। तुम्हारी जो लगातार (प्लेज़र)सुख की तलाश है तुम्हें थोड़ा इससे हटना पड़ेगा।

~ आचार्य प्रशांत

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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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