सरलतम व श्रेष्ठतम मन ही आध्यात्मिक हो सकता है

एक सामान्य आदमी तो फिर भी शायद कभी जगे पर ये लोग जो प्रोफेशनल कहलाते है समाज में और थोड़ा पैसा भी कम लेते हैं, इन लोगों का जगना तो असंभव है क्योंकि इनके सामने इनकी उपलब्धियां ही बाधा बन जाएंगी, वो कहेंगे कि इन्हें छोड़ें कैसे और ये माने कैसे कि हमने जो आज तक करा वो फिज़ूल था। ये मानने में बड़ा कष्ट है कि, “जीवन व्यर्थ गया, ज़िन्दगी बेवकूफी में काट दी, ये हम नहीं मान सकते।” ये मान लिया तो अहंकार बिलकुल टूट जाएगा।
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न जानने में बड़ा जानना है

पूर्ण मदः पूर्ण मिदं
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शांति मंत्र को तार्किक मत समझ लीजियेगा, ये तो घोर अतार्किक है;
अतार्किक कहना भी बड़ी तार्किक बात हो गयी।

ये तर्क की सीमा के ही पार है, न तार्किक है न अतार्किक है।
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आप आमंत्रित हैं बोध सत्र में

दिनांक: 27 जुलाई, 2016
दिन: बुधवार
समय: शाम 6:30 बजे से

मौत को कौन जीतता है?

जिसको तुम मन बोलते हो, वह मैल है। कोई दूसरा व्यक्ति भी होता है जिसने मैल के अतिरिक्त भी मन को जाना होता है। जिसने मैल के अतिरिक्त भी स्वयं को जाना होता है।

तुम अपने आप को उतना ही जानते हो न जितना तुम अपनी हैसियत, सामर्थ्य को जानते हो।

तुम अपनी अनंतता को थोड़ी जानते हो। तुम तो अपनी क्षुद्रता भर को जानते हो।

उसी को तुम बोल देते हो, यह मैं हूँ।

उम्र के साथ उलझनें क्यों बढ़ती हैं?

बच्चे को बता दिया जाता है कि “तुझे कुछ और बन जाना है”।
बच्चे को बता दिया जाता है कि “जैसा तू है, अगर ऐसा रहा, तो दुनिया तुझे लूट खाएगी। चल, तू चालाक हो जा”।

तुम बच्चे जैसे ही रहो। तुम थोड़े भोले ही रह जाओ।

हो सकता है, उसमें थोड़े-बहुत तुम्हें नुकसान हों, पर झेल लो उन नुकसानों को। नुकसान तो होगा, पर जो तुम्हें मिलेगा, वो बहुत कीमती होगा। तो मिला-जुला कर, ख़ूब फ़ायदा ही फ़ायदा होना है।

सत्य और संसार दो नहीं

धार्मिक आदमी वो नहीं है जो मंदिर जाता है, धार्मिक आदमी वो है जिसे मंदिर जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती क्योंकि उसके लिए हर दिशा मंदिर है | वो जिस जगह खड़ा है वो जगह मंदिर है | वो मंदिर को अपने साथ लेकर चलता है | वो है, धार्मिक आदमी | वो विभाजन कर ही नहीं सकता | वो रेत पर खड़ा है तो रेत मंदिर है, पत्थर पर खड़ा है तो पत्थर मंदिर है, इमारत पर खड़ा है तो इमारत मंदिर है |

उसको किसी मूर्ति की आवश्यकता नहीं है, उसको किसी विशेष कक्ष की आवश्यकता नहीं है कि “यहाँ पर ही मेरी पूजा होगी” | जितनी भी मूर्तियाँ हैं, जो भी कुछ मूर्त रूप में है, वही पूजनीय है |

अपने ऊपर भरोसा क्यों नहीं है?

बात सिर्फ़ आत्मविश्वास की नहीं है । ‘हमें विश्वास ही नहीं है । हमें किसी भी व्यक्ति पर, चीज़ पर, घटना पर, किसी भी बात के होने पर यकीन ही नहीं है । हमें यह भी ठीक-ठीक यकीन नहीं है कि हमारे पाँव-तले ज़मीन है कि नहीं है ।

यह सुनने में अतिश्योक्ति लगती है, पर बात ऐसी ही है । तुम जिन भी बातों पर बड़ा गहरा यकीन करते हो, कोई आकर, कुछ भारी और तीख़े तर्क देकर, उन सब यकीनों को हिला सकता है । तुम्हारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जो जड़ से उखाड़ा न जा सकता हो ।

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