निकटवर्ती को ही हाथ बढ़ा कर सहारा दिया जा सकता है

दुनिया तुम्हें सिखाती है कि तुम कुछ बने तब, जब तुम्हें जटिल होना आया। दुनिया ने तुम्हें जो भी कुछ सिखाया है, उसने तुम्हें जटिलता की ओर अग्रसर किया है पर जीवन में तुम कुछ तब हुए जब तुमने अपनी सरलता पुनः प्राप्त की। बड़ा अंतर है। समाज तुम्हें कुछ तब मानेगा, जब तुम खूब जटिल हो जाओगे पर जीवन तुम्हें कुछ तब ही मानेगा जब तुम एक दम सरल हो जाओगे। फिर ॐ भी समझ में आएगा, प्रेम भी समझ में आएगा, प्रज्ञान भी समझ में आएगा और ब्रह्म भी समझ में आएगा।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न : http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

रिक्त हृदय भर कब पाया लेने से, पाया कितना यह साबित होता देने से

आपका कोई करीबी है, एक उदाहरण ले रहा हूँ, कोई प्रियजन है आपका, कोई मित्र है, कि रिश्तेदार है, आपको लगता है वो आपसे दूर हुआ जा रहा है। एक ही तरीका है उसको करीब लाने का, उसको बाँट दीजिए, उसको जगत को समर्पित कर दीजिए। आप उसको जितना दे दोगे दुनिया को, वो उतना आपको मिल जाएगा वापिस।

अस्तित्व का बेशर्त नृत्य

प्रकृति को नाचना पसंद है।

प्रकृति आपके साथ तब नहीं नाचती जब अहंकार बीच में आता है। नहीं तो नाचती है, ख़ूब नाचती है। हमारे खरगोश हैं दों नीचे, आप उन्हें पकड़ कर दिखाइये, बड़ा मुश्किल है आपके लिए, दावा करके कह रहा हूँ। और अभी तो शायद पकड़ भी लें क्योंकि छोटे कमरे में कैद हैं बेचारे, तो बहुत कहाँ भागेंगे। थोड़ा खुले में करदें फ़िर आप उन्हें छू कर दिखा दीजिये! आप छू नहीं पाएंगे। और उसके बाद आप बस इतना करिए कि लेट जाइये, शांत होकर के बैठ जाइये, या लेट जाइये, फ़िर देखिए प्रकृति का नाच! अभी आप कर सकते हैं प्रयोग। अभी कर के देखिए। आप उनके पीछे दौड़िए, कि “मैं तुझे पकड़ लूँगा”, और वो आपको छूने नहीं देंगे, और आप एक हो जाइए बस, वहीँ पर शांत हो जाइए, स्थिर, और लेट जाइए, फ़िर देखिए। फिर क्या होगा जानते हैं? क्या होता है? वो आपके ऊपर आकर बैठ जाते हैं। आप लेटें हो, और वो आपके सीने पर चढ़कर बैठ जाएंगे। और आप उन्हें भगाइए, भागेंगे नहीं। भाग जायेंगे, फ़िर थोड़ी देर में ऐसे देखते रहेंगे, फ़िर पास आ जायेंगे।

हाँ, आप हाथ बढ़ाओगे पकड़ने को, यह मत करना!

तुम भी मुक्त, हम भी मुक्त, और अपनी-अपनी मुक्ति में दोनों मस्त हैं, नाचेंगें।

मैं तुम्हारे पास सिर्फ़ तब आ सकता हूँ जब तुम मुझे मुक्त रहने दो। मुझे मुक्त रहने दो, मैं खुद आ जाऊंगा तुम्हारे पास। हाँ, कैद करना चाहोगे, तो मेरा-तुम्हारा रिश्ता बड़ा ख़राब हो जाएगा। इसी मुक्ति का नाम प्रेम है।

प्रेम क्या?

जो दूसरे को मुक्ति दे, वही प्रेम है।
हमारा और दूसरे का एक ही रिश्ता हो सकता है: मुक्ति का।

सत्य के लिए साहस नहीं सहजता चाहिए

सत्य का मार्ग अति सहज है, उसमें साहस चाहिए ही नहीं।

साहस और डर तो द्वैत युग में है। ये इकट्ठे चलते हैं — जहाँ डर है वहीं साहस की मांग है। और सत्य में कहीं डर होता नहीं। किसी को अगर डर लग रहा है, वह साहस की मांग कर रहा है, इसका अर्थ एक ही है, क्या? कि उसको जो भी विचार आ रहा है वो निरर्थक ही है। और विचार अधिकांशत: निर्थक होते ही हैं।

कोई साहस नहीं चाहिए। जितना अपनेआप से ये कहोगे कि मुश्किल है रास्ता, उतना तुम अपनेआप को यकीन दिला रहे हो कि मुझे चलने की ज़रूरत नहीं। मैं चल ही नहीं पाऊंगा, मेरे बूते से बाहर की बात है, अति कठिन है रास्ता।

जो भयानक है वो कुछ छीन नहीं सकता,जो आकर्षक है वो कुछ दे नहीं सकता

जाँच करें, थोड़ा प्रयोग करें। जो कुछ बहुत कीमती लगता है, उससे अपने आप को ज़रा सा दूर करें। जो कुछ बहुत डरावना लगता है उसके ज़रा नज़दीक आएँ और देखें कि क्या हो जाता है। क्या वास्तव में उतना फायदा या उतना नुकसान है, जितने की कल्पना कर रखी है? क्या मिल जाता है? क्या खो जाता है? आप जब किसी चीज़ को महत्वपूर्ण बना लेते हैं तो, आप उस पर किसी भी तरह का प्रश्न उठाना छोड़ ही देते हो। आप कहते हो “ऐसा तो है ही।’’ आप ये जाँचना ही छोड़ देते हो कि क्या वास्तव में ऐसा है?
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25वां अद्वैत बोध शिविर आचार्य प्रशांत के साथ आयोजित किया जाने वाला है।

दिनांक: 16 से 19 अक्टूबर

स्थान: मुक्तेश्वर, उत्तराखंड

आवेदन हेतु requests@prashantadvait.com पर ई-मेल भेजें।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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