न चिंता न चाहत, स्वभाव तुम्हारा है बादशाहत

ये जो मुंह का लटकाना है, इसको समझलो ये सज़ा है। कोई न कोई तो रहा होगा जिसने प्रेम से समझाया होगा। कहीं से तो आवाज़ आई होगी कि “मान जाओ। ” जब नहीं माने, करली अपनी, तो फिर मिलती है सज़ा। और उससे बच तो पाते नहीं। कोई व्यक्ति मारता है, तो शिकायत भी कर पाते हो, परिस्थितियाँ ऐसा थपेड़ा देती हैं कि शिकायत भी नहीं कर पाते। पर उनके पंजों के निशान गाल पर ज़रूर नज़र आते हैं। अब किसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराओगे? अब बस यही बोल पाते हो, “अरे! किसमत खराब है। मैं क्या करूँ? मेरे साथ ऐसा हो गया। ”
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1.) अद्वैत बोध शिविर
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2.) आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स
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सम्मान और ज़िम्मेदारी माने क्या?

पति बोलते हैं पत्नियां बड़ा डोमिनेट कर लेती हैं। कोई पत्नी तुम्हें डोमिनेट कर सकती है, तुम्हारे मन में अगर उसकी बॉडी का लालच न हो तो? तुम उसकी बॉडी के पीछे भागते हो, उसी के कारण वो तुमको नाच नचा देती है! और कोई हथियार नहीं है उसके पास। बस यही हथियार है कि तुम्हारे मन में लालच है कि किसी तरह इसका शरीर मिल जाये। और वो इतना नचाएगी तुमको, इतना नचाएगी कि मर जाओगे! उसको तुम्हारे पैसे का लालच है, तुम्हें उसके शरीर का लालच है। दोनों एक दूसरे को नचा रहे हो, फिर दोनों रोते हो! घर-घर की यही तो कहानी है, और क्या चल रहा है? मरी से मरी औरत समर्थ से समर्थ आदमी पर राज करती है!
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आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 31वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य जी के सानिध्य में रहने का और दुनियाभर के दुर्लभ शास्त्रों के इस अनूठे अवसर को न जाने दें।

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माफ़ करने का क्या अर्थ है?

बेहोशी का तो एक ही प्रायश्चित है, क्या? ‘होश।’ वास्तविक क्षमा का अर्थ यह है कि “मैं तेरी कही हुई बात को, या फिर तेरे करे हुए कुकर्म को, गंभीरता से ले ही नहीं रहा।” क्षमा का अर्थ तो यह हो गया, जो आम तौर पर हम ले लेते हैं कि, “तूने जो करा, उससे मुझे चोट लगी। जा तुझे माफ़ करता हूँ। तूने मुझे चोट दी। मैं तुझे माफ़ करता हूँ।” ना। समझदार आदमी कहता है कि ‘तूने मुझे चोट दी ही नहीं।’ यह हुई वास्तविक क्षमा।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: टाइगर ग्रूव रिसोर्ट, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क रामनगर(उत्तराखंड)

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‘अप्प दीपो भव’ के विकृत अर्थ

तुम कहते हो, “देखिए हमें हमारे मन की करने की आज़ादी नहीं दी जा रही है, हमारे ऊपर एक बाहरी व्यवस्था लादी जा रही है। हम क्यों माने किसी की बात? हम क्यों चले किसी और के दिये नियम-कानूनों पर? हमें हमारी करने दो ना।” तुमने कभी गौर किया है कि तुम जिसे कहते हो कि तुम्हारी करने दो, वो है क्या? उसमें तुम्हारा है कितना? तुम कहते हो “नहीं नहीं मुझे मेरे मुताबिक़ नौकरी करने दो, मुझे मत बताओ कि क्या सही, क्या गलत।” ठीक है नहीं बताएंगे, पर तुम यह बता दो कि अगर तुमको सामाजिक पट्टी न पढ़ाई होती, तो तुम्हें यह पता भी होता कि नौकरी जैसी कोई चीज़ होती है? और यदि तुम किसी दूसरे समाज में होते जहाँ तुम्हें दूसरे तरीके से संस्कारित कर दिया होता, तो क्या तुम इसी तरीके से और इन्हीं नौकरियों के पीछे भागते?
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
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सच क्या कभी तुम्हें भाएगा?

कई मायनो में योगभ्रष्ट, वियोगी से भी ज़्यादा अभागी होता है क्यूंकि वियोगी को तो अवसर मिला नहीं; योगभ्रष्ट को मिला और वो चूक गया। तुम यहाँ आए हो — अद्वैत में — मेरे समीप, ये सौभाग्य की भी बात है और बड़े से बड़ा खतरा भी है तुम्हारे लिए। सौभाग्य इसलिए क्यूंकि मौका है, अवसर है जान सकते हो, अपनेआप को पा सकते हो, और खतरा इसमें ये है कि ये ऊँची से ऊँची संभावना है, इससे अगर चूक गए, तो अब जिंदगी भर कुछ नहीं पाओगे। क्यूंकि जो उच्चतम तुम्हें मिल सकता था वो मिला, दैव्य मेहरबान हुआ, अनुग्रह हुआ, बारिश हुई; तुम्हीं भीग ना पाए। तो बढ़िया है, अच्छा है, कोई ख़ास ही घटना होगी, जो घटनी होती है। आमंत्रण सबको आते हैं; सब आमंत्रित नहीं हो पाते। तुम आमंत्रित हो रहे हो, सौभाग्य है।
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भक्ति योग एवं पुरुषोत्तम योग आचार्य प्रशांत के साथ
6 मार्च से आरम्भ
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शरीर को महत्त्व देना ही है उम्र का सम्मान

जितना तुम्हारा देह भाव गहरा रहेगा, उतना ज़्यादा तुम उम्र को इज्ज़त दोगे| सवाल ये नहीं है कि तुम्हारे भीतर ये संस्कार कहाँ से आ

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