दो सूत्र – अपने प्रति ईमानदारी, अपने प्रति हल्कापन

बाहर से जो आ रहा है वो प्रभाव है, आदत है, ढर्रा है, सुख-दुःख और कुछ नहीं है, यही ढर्रों के नाम हैं। प्रयोग करके देख लो अपनेआप को ये प्रशिक्षण करके देख़ लो कि रोज़ शाम के 7 बजे सुखी हो जाना है; हो जाओगे। अकारण, बस ढर्रा है, ढर्रों का कोई कारण थोड़ी होता है। रोजाने आपको ये प्रशिक्षण दे लो कि कौवे की आवाज़ सुनते ही दुखी हो जाना है, हो जाओगे। मन और शरीर तो प्रशिक्षण पर चलते हैं। हाँ, प्रशिक्षण ऐसे गहरे हो जाते हैं कि लगते ही नहीं कि कभी प्रशिक्षित हुए थे, फिर लगता है कि जैसे ये तो स्वभाव है। तुम्हारी गहरी से गहरी वृत्ति भी मात्र प्रशिक्षण है, जो तुम्हें समय ने दिया है, बड़े लम्बे समय ने, और कुछ नहीं है। उसके पीछे कोई वैध मूल कारण नहीं है। माया अनादि होती है, उसका कारण नहीं खोज पाओगे।
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संसार के बीचोंबीच संसार से मुक्त

आपके गले में खराश हो, आप किसी ऐसे को समझा के बता दीजिये, जिसके गले में कभी खराश ना हुई हो। आप जितने शब्दों का प्रयोग करना चाहें, आप पूरा ग्रन्थ लिख कर के उसे समझा दीजिये, तो भी आप नहीं समझा सकते। तो ये नापसंदगी की बात नहीं है कि, ‘’मुझे गले की खराश नापसंद है। ये बात ये है, कि मैं जानता ही नहीं। मेरे भीतर वो ताक़त ही नहीं है कि मैं गले की खराश की बात कर पाऊँ। इसलिए मैंने कहा था, स्वास्थ्य कुछ विशेष ताक़त नहीं है। स्वास्थ्य तो, निर्विशेष हो जाना है। बीमारी और ग़ुलामी में कुछ विशेष होता है। मुझे पता ही नहीं है, तुम क्या बातें कर रहे हो।
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अपनी आदतों के सिवा मैं कुछ और नहीं

आदतें जानते हो आप, जो कुछ भी जानकारी के दायरे में आता है, अतीत से आता है, जो भी आप जानते हो और बार-बार करना चाहते हो, जो बार दोहराना चाहते हो, जिसमें मन को सुरक्षा की भावना मिलती है – वो आदत है। मन कहता है, ‘’मैं एक राह पर चल रहा था पिछले 20 सालों से और मेरा कुछ ख़ास बिगड़ नहीं गया , तो अब मैं इसी राह पर और 20 साल चल लेता हूँ। जब आज तक नहीं कुछ हुआ तो अब क्या होगा’’ – यही आदत है। और मैं हूँ कौन? उससे राह पर चलने वाला।
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साक्षित्व का वास्तविक अर्थ

जो सोचने की वस्तु हो, उसके बारे में सोचो और जो सोचने की वस्तु नहीं है, उसके बारे में नहीं सोचो, बस यही आध्यात्म है पूरा। जिसके बारे में सोचा जा सकता है, उसके बारे में खूब सोचो पर कृपा करके उसके बारे में मत सोचने लग जाओ, जिसके बारे में सोचना व्यर्थ है। हम उलटे हैं, जिसके बारे में सोचना चाहिये वहाँ हम सोचने से डरते हैं, हम विचार भी तो नहीं करते ताकतवर, पूर्ण, गहरा विचार हम कहाँ करते है? डरते हैं। जहाँ सोचना चाहिये, वहाँ हम सोचते नहीं और जहाँ सोचना मूर्खता है, वहाँ हम खूब सोच का जाल फेंकते रहते हैं।
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प्रेम और आकर्षण

आप तीस-चालीस साल किसी भी चीज़ के साथ रहो, आपको आदत पड़ जाएगी। आप एक छड़ी के साथ रहो, तो आप बिछुड़ नहीं पाओगे। आप एक जानवर के साथ तीस साल रहो, आपको आदत पड़ जाएगी। आप एक मोटर कार तीस साल चलाओ, आपसे वो बेची नहीं जाएगी – ये प्रेम नहीं है। और अक्सर जो पुराने लोग होते हैं, थोड़े उम्र दराज़, वो आज कल के लोगों को यही कहते हैं कि तुम्हारा प्यार क्या है? तुम्हारा प्यार सिर्फ़ शारीरिक आकर्षण है। ”मुझको देखो, अपनी दादी को देखो, हम में कोई शारीरिक आकर्षण नहीं, फिर भी हम कितने जुड़े हुए हैं।” उनकी बात यहाँ तक तो ठीक थी कि जवान आदमी का जो प्यार है, वो क्या है? शारीरिक आकर्षण। लेकिन वो भूल गए कि अगर जवान आदमी के पास प्रेम नहीं है, तो प्रेम तुम्हारे पास भी नहीं है। वो जुड़ा है शरीर के वशीभूत होकर और तुम जुड़े हो आदत के वशीभूत होकर।
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ईमानदारी, सत्य, पूर्णता

तुमने कोई चीज़ चुराई है और तुम्हें पता है कि छिंन तो जानी ही है। पुलिस वाला आएगा और मार पीट के ले जाएगा, तो उसको हम हर समय छुपाए-छुपाए फिरते हो।यही पोज़ेसिवनेस है – किसी ऐसी चीज़ पर दावा करना जो तुम्हारी है नहीं।तो उसमें दो चीज़े दिखाई देंगी: पहला तुम उसे पकड़े-पकड़े घूमोगे।दूसरा तुम्हें डर लगा रहेगा कि कोई आ कर इसे छीन ले जाएगा।
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