कामवासना और प्रेम में क्या अंतर है?

तुम किसी औरत के पास जाते हो, कोई औरत किसी आदमी के पास जाती है। दोनों, वास्तव में, न आदमी से सरोकार रख रहे हैं, न औरत से सरोकार रख रहे हैं, हर आदमी को परमात्मा चाहिए। तुम इसमें भी परमात्मा खोज रहे हो, इन सवालों में भी, उस पानी में भी, खाना खाने जाओगे, उसमें भी, कोई नौकरी करोगे, उसमें भी, किसी से मिलोगे उसमें भी, और सम्भोग के क्षण में, औरत में भी। हर आदमी, औरत के माध्यम से परमात्मा को पाना चाहता है; हर औरत, आदमी के माध्यम से परमात्मा को पाना चाहती है। यही कारण है, कि आदमी और औरत का रिश्ता, कभी बहुत पक्का हो नहीं पाता।

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कदम-कदम पर तरीके मौजूद हैं तुमको क्षुद्रता में धकेलने के लिए|

बड़ी कम्पनियाँ बड़े ऑफिस बनाती हैं| और तुम्हारे भीतर हसरत जागती है कि मैं इन बड़े-बड़े ऑफिसों में काम करूँ| और तुम ये देख ही

कहीं भी मन क्यों नहीं लगता?

अपने आस-पास की दुनिया को देख लो या अपने ही मन को टटोल लो, तुम्हें यही दिखाई देगा कि कोई भी चीज़ ऐसी नहीं होती जिसमें मन लगा रह सके| कोई भी रिश्ता ऐसा नहीं होता| थोड़ी देर के लिए तुम्हें भ्रम ज़रूर हो जाएगा की मन लग गया है पर भ्रम टूटेगा| और जितनी बार वो भ्रम टूटेगा उतनी बार तुम भी टूटोगा|

मन लगेगा, दोहरा रहा हूँ, (लेकिन) किसी काम में नहीं लगेगा| हर काम में रहेगा| जहाँ हो, वहीँ लगेगा| तुम ऐसे आदमी की तरह हो जाओगे जिसका पेट भरा हुआ है, जिसका दिल भरा हुआ है, जो खूब मस्त है| अब वो जो भी करेगा, कैसा करेगा? मज़े में करेगा ना|

~आचार्य प्रशांत
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जो तुम्हारी गुणवत्ता है और जैसा तुम्हारा जीवन है, तुम्हारे रिश्ते की भी वही गुणवत्ता होगी|

लोग आते हैं, बात करते हैं रिश्तों की, संबंधो की – दोस्त आते हैं, ज़्यादातर तो पति-पत्नी ही आते हैं या जोड़े| मैं कभी नहीं

क्या एक साथ रहने से प्यार बढ़ेगा?

लोग आते हैं, बात करते हैं रिश्तों की, संबंधो की – दोस्त आते हैं, ज़्यादातर तो पति-पत्नी ही आते हैं या जोड़े| मैं कभी नहीं कहता कि तुम दोनों के “बीच” में कुछ गड़बड़ है, गड़बड़ दोनों के “बीच” में नही होती है- गड़बड़ “दोनों में” होती है|

तुम ठीक हो जाओ, और तुम ठीक हो जाओ तो तुम्हारा रिश्ता अपने आप ही ठीक हो जाएगा , तुम्हारा रिश्ता तुम दोनों की गुणवत्ता से कुछ जुदा थोड़ी है|

जो तुम्हारी गुणवत्ता है और जैसा तुम्हारा जीवन है तुम्हारे रिश्ते की भी वही गुणवत्ता होगी|
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