एक ठीक रखो, सब ठीक रहेगा

जो ‘एक’ पर ध्यान देता है, उसका सब ठीक हो जाता है।
तुम्हारे साथ दिक्कत यही है कि तुम ‘एक’ को जानते नहीं, बाकी तुम्हें दस चीज़ें आयोजित करनी हैं।

‘एक’ को पकड़ो, ‘एक’ को। फिर बाहर जो भी चल रहा होगा, मज़ेदार होगा।

ज़िंदगी में कुछ ऐसा रखो, जो बिल्कुल पक्का हो, उसके बाद ऊँच-नीच, ये सब तो चलती रहती है।
ये तो खेल है ज़िंदगी का, उसकी बहुत फ़िक्र नहीं की जाती। कभी अच्छा, कभी बुरा, कभी कैसा।

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