दूसरों की मदद करने की ज़रूरत क्या है? || आचार्य प्रशांत (2019)

दुनिया में जितने भी कुकृत्य हैं, पाप हैं, अध्यात्म सीधे उनकी जड़ काट देता है।

और जो भांति -भांति के सामाजिक आन्दोलन होते हैं, वो सिर्फ़ पत्ते नोचते हैं, टहनियाँ तोड़ते हैं।

सामाजिक आन्दोलन इसीलिए कभी विशेष सफल नहीं हो सकते।

समाज में छवि बनाने की चाह क्यों रहती है? || आचार्य प्रशांत (2018)

आदमी क्यों अपनी छवि के प्रति सतर्क रहता है, जानते हो?

क्योंकि छवि का भी सीधा-सीधा सम्बन्ध तुम्हारी भौतिक सुख-सुविधाओं से है।

कुत्ता बुरा नहीं मानेगा अगर तुम उसे गाली दे दो।

पर कुत्ता बुरा मानेगा न अगर तुम उसकी रोटी छीन लो?

तुम्हारी भी छवि से तुम्हारी रोटी बंधी हुई है, इसलिए डरते हो।

तुमने अपनी रोटी क्यों दूसरों के हाथ में दे रखी है?

समाज से मिली शर्म || आचार्य प्रशांत, ओशो पर (2017)

ग्लानि तुम्हें इसलिए थोड़े ही उठती है कि तुम्हारी आत्मा ने बताया है कि तुम ग़लत हो, ग्लानि तुम्हें इसलिए उठती है क्योंकि तुम्हें समाज ने बताया है कि तुम ग़लत हो।

आत्मा से तुम जानते हो, बोध उठता है, और बोध की परिणीति कभी ग्लानि नहीं होती।

ग्लानि में तो ‘तुम’ बचे रह जाते हो, बोध में ‘तुम’ गल जाते हो।

बोधशिविर से फ़ायदा क्या है? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2016)

जो आदमी बार-बार मौत की बात कर रहा है, वो जीवन को उसकी पूर्णता में देख रहा है।

और जो पूर्णता में स्थापित है, उसमें ही ये हिम्मत आती है कि वो मौत की बात कर पाए।

इसलिए संतों ने बार-बार, मौत का हमें स्मरण कराया है। लगातार मौत की बातें करते हैं, मौत के गीत गाते हैं।

समाज तुमसे कहता है मौत को भूल जाओ, संत तुमसे कहता है, मौत को लगातार याद रखो।

समाज कहता है कि मौत को भूलोगे, तो सुख में जियोगे। लेकिन समाज की सलाह पर चल कर, मौत को तो तुम नहीं ही भूल पाते, दुःख को तुम ज़रूर आमंत्रित कर लेते हो।

संत तुमसे कहता है, मृत्यु को सदा याद रखो। और संत की बात पर चल कर जब तुम मृत्यु को याद रखते हो, तो जीवन को उपलब्ध हो जाते हो। जिसे मौत याद है, वो खुल के जीता है।

~ आचार्य प्रशांत

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निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं :-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.comपर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

लोग क्या कहेंगे? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

सभी को लगता है। किसको नहीं लगता?

लेकिन लगने के बाद फ़र्क होता है लोगों में।

कुछ लोग होते हैं जिनको जैसे ही ये लगा, वो वहीं रुक जाते हैं कि – लोग क्या सोचेंगे।

दूसरे होंगे, उन्हें लगेगा कि – ‘जनता क्या बोलगी,’ पर वो कहेंगे, “अच्छा, ख़याल ही तो है! ख़याल का तो काम है ये बोलना। मस्तिष्क ही तो है। मस्तिष्क और करेगा क्या? मशीन ही तो है। मशीन की कार्यरचना है कि दूसरों के राय-मशवरों को देखो, सुविधा की परवाह करो, आदर की परवाह करो। तो ये परवाह कर रहा है, इसे करने दो।”

ये देखना हो गया।

कई बुद्ध पुरुषों ने समाज क्यों छोड़ा? || आचार्य प्रशांत (2017)

वास्तव में एक बुद्ध ही सामाजिक हो सकता है, हम नहीं हैं सामाजिक।

हमारा तो जैसा समाज है ,वहाँ क्या होता है?

वहाँ लड़ाईयाँ होती हैं।

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