असली आज़ादी है आत्मा

शरीर भर है जिसे पूरी तरह बाँधा जा सकता है। मन पर सीमा लगाने की कोशिश की जा सकती है पर वह बहुत सफल होगी नहीं और आत्मा पर तो वह कोशिश भी नहीं की जा सकती।

तो इंसान है जो बाँधने की कोशिश करता है और वह भी उसी हद तक जिस हद तक तुम्हारा आचरण है।

अब एक इंसान दूसरे इंसान के आचरण को बाँधने की कोशिश कर रहा है।

मेरा असली स्वभाव क्या है?

कुत्रापि खेद: कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।  मन: कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थित: सुखम्।।  ~ अष्टावक्र गीता(१३.२)  अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ है, वाणी के दुःख भी

क्या एकाग्रता ध्यान में सहयोगी है?

प्रश्न: क्या एकाग्रता ध्यान में सहयोगी है? वक्ता: नहीं। हाँलांकि, विशिष्ट परिस्थितियों के अंतर्गत ऐसा हो सकता है। तुम्हें गुरु के पास वापस आना ही

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