अतीत की असफलताओं का क्या करूँ?

वक्ता: आर्येन्द्र का सवाल है कि कुछ काम किया और असफलता मिली, तो मन में कुछ ऐसी गाँठ बन गयी है कि आगे भी काम

मैं मन का गुलाम क्यों?

तो तुम ये कहना चाह रहे हो कि तुम मन से अलग कुछ हो। यही मान कर चल रहे हो ना? श्रोता : हाँ। वक्ता :

जीवन क्या है?

प्रश्न: जीवन क्या है? वक्ता: जीवन का क्या अर्थ है? क्या जीवन का अर्थ यही है- उठना, बैठना, खाना, पीना, चलना, सोना और मर जाना? क्या यही

बाहरी प्रेरणा साथ नहीं देती

बाहरी आता है, एक माहौल बनाता है, तुम्हारे मन को बिलकुल आंदोलित कर देता है l उसके रहते मन आंदोलित होता है पर क्या ऐसा उत्साह सदा रह सकता है? प्रभाव जाएगा और उसके साथ तुम्हारा उत्साह भी चला जाता है l

और क्या जीवन हमने ऐसे ही नहीं बिताया है ?

रात गयी बात गयी

रात गयी, बात गयी l वो बीत गया- अब उसका सवाल क्यों पूछना ?
ये बीमारी तुम सब के साथ है, एक की ही नहीं है l तुम अतीत के साथ अभी भी चिपके हुए हो l सपना था, बीत गया, सपने में कर दिया किसी का क़त्ल, अब क्यों प्रायश्चित कर रहे हो ?

अमीर कौन, ग़रीब कौन?

जिसको और चाहिए – वो गरीब है। जिसे और नहीं चाहिए- वो अमीर है। जिसे ही और चाहिए, बात सीधी है, जो भी कह रहा है कि और मिल जाए, इसका मतलब है कि वो गरीबी अनुभव कर रहा है। तभी तो वो कह रहा है कि और चाहिए। तो गरीब वो नहीं जिसके पास कम है, गरीब वो जिसे अभी और चाहिए।

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