जीत में जीते नहीं, न हार में हारे

जो उचित है, वो करो । नतीज़ा क्या आता है, छोड़ो । क्योंकि कोई भी नतीजा आखिरी कब हुआ है? तो नतीजे को नतीजा कहना ही बड़ी बेवकूफी है । कभी कहीं जाकर के कहानी रूकती हो तो तुम बोलो ‘द एंड’ । जब कहानी कहीं रूकती ही नहीं तुम क्यों कहते हो कि कहानी का नतीजा यह निकला । अनंत कहानी है, तो कैसे पता कि चूक गये?

भ्रांत कौन, और किसके लिए?

अंतर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः। भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्-तादृशा एव जानते॥ – अष्टावक्र गीता (१४- ४) अनुवाद : भीतर से निर्विकल्प और बाहर से स्वच्छंद आवरण वाले, प्रायः भ्रांत

मेरा असली स्वभाव क्या है?

कुत्रापि खेद: कायस्य जिह्वा कुत्रापि खेद्यते।  मन: कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थित: सुखम्।।  ~ अष्टावक्र गीता(१३.२)  अनुवाद: शारीरिक दुःख भी कहाँ है, वाणी के दुःख भी

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