कालातीत योग और समकालीन चुनौतियाँ

चित्त की वृत्ति का निरोध वास्तविक योग है!

जो तुम्हारी आदतें हैं, जो तुम्हारी वृत्तियाँ हैं, उनसे तुम आज़ाद हो जाओ, उनसे तुम्हें मुक्ति मिल जाए, यही मोक्ष है – यही योग है।

तो, हठयोग इसीलिए दिया गया था ताकि तुम वास्तविक योग के दरवाज़े तक पहुँच सको। पर जिसका उपयोग होना चाहिये था वास्तविक योग के तुम्हें दरवाज़े तक पहुँचाने के लिए, आज उसका उपयोग होने लग गया है वास्तविक योग से तुम्हें दूर रखने के लिये। यहाँ तक कि आज हठयोग को ही योग माना जाने लगा है।

अगर कोई आपसे मिले और कहे कि वह योग करता है, तो निन्यानवे प्रतिशत सम्भावना है कि वो शारीरिक योग करता है, हठयोग के आसन, मुद्राएँ आदि करता है। जबकि हठयोग, हठयोग प्रदीपिका के अनुसार ही सीढ़ी मात्र है। वास्तविक और आखिरी योग नहीं है हठयोग! लेकिन आज हठयोग ही योग के सामने एक बड़ी चुनौती बन कर खड़ा हो गया है। लोग हठयोग कर के ही संतुष्ट हो जाते हैं। जब आप हठयोग कर के ही संतुष्ट हो गए तो असली योग में आप प्रवेश कैसे करेंगे?

सीढ़ी, द्वार का विकल्प बन गयी है; और, सीढ़ी द्वार का विकल्प बन के द्वार की दुश्मन बन गयी है।

तो मैंने जो दो चुनौतियाँ बोलीं वर्तमान युग में योग के समक्ष – एक वृत्तियों का बल और दूसरा वृत्तियों से पलायन के प्रचुर साधन; इनमें आप एक तीसरी चुनौती भी जोड़ लें! सच्चे योग के सामने हठ योग दुर्भाग्यवश आज एक चुनौती बन गया है।

मैं हठ योग की उपयोगिता से इंकार नहीं कर रहा। शरीर को दीक्षित किया जाना ज़रूरी है। और बहुत लोग ऐसे हैं जिनके अगर शरीर को दीक्षित नहीं किया गया, तो वो मन के तल पर कभी पहुँच ही नहीं सकते; क्योंकि, जो आदमी जिस तल पर है, उसकी शिक्षा-दीक्षा की शुरुआत वहीं से हो सकती है।

जो शरीर से बहुत ज़्यादा तादात्म्य रखता हो, जो बहुत देहभाव में जीता हो, उसकी आध्यात्मिक शिक्षा की शुरुआत तो देह से ही होगी। इसीलिए हठयोग आवश्यक है; क्योंकि हठयोग का पूरा ताल्लुक देह से है। तो मैं हठयोग की उपयोगिता से इंकार नहीं कर रहा, लेकिन हठयोग के बाद व्यक्ति को अष्टांगयोग में आरूढ़ होना चाहिये, प्रविष्ट होना चाहिये। वो कहीं होता नहीं दिखता।

लोग वज़न घटाने के लिये, स्वास्थ्य लाभ करने के लिए योग का सहारा ले रहे हैं। योग सिर्फ़ इसीलिए नहीं है कि तुम स्वास्थ्य लाभ कर के रुक जाओ। ये तो हमने योग को व्यायाम के तल पर उतार दिया।

योग, व्यायाम नहीं है। पर अधिकाँश लोग योग का इस्तेमाल सिर्फ देह को चमकाने के लिए कर रहे हैं। ये योग के साथ बड़ा हमने अन्याय कर डाला; और क्योंकि योग के साथ अन्याय किया नहीं जा सकता, तो वास्तव में हमने अपने ही साथ अन्याय कर डाला।

~आचार्य प्रशांत
________________
निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
~~~~~
२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
~~~~~
३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
~~~~~
४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
~~~~~
५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
~~~~~
६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
~~~~~~
७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
~~~~~
८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
~~~~~~
९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
~~~~~~
१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

~~~~~~
इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.comपर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

पूरी क़ायनात में सिर्फ़ आदमी ही बेघर है

बहुत-बहुत अजीब बात है, कि हमने हर उस बात को गौरवान्वित किया है जो हमारी बीमारी है। जिसको हम अपनी सभ्यता और संस्कृति कहते हैं वो उन्ही खम्बों पर खड़ी है जो खम्बे हमारी छाती पर गड़े हुए हैं। जो हमारे मन पर मनोबोझ हैं। आदमी के मन की मूल बीमारी है उसकी कुछ पा लेने कि हसरत और आधुनिक युग ने उसे प्रगति का, तरक्की का नाम दिया है। तरक्की से ज्यादा बड़ी बीमारी कोई दूसरी नहीं। और जब आप तरक्की की तलाश में है तो कोई घर आपको सुहाएगा नहीं। आप जीवन भर बेघर ही रहोगे। घर का अर्थ है वो स्थान जहाँ चैन पा जाओ।

आचार्य प्रशांत
____________

निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
~~~~~
२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
~~~~~
३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
~~~~~
४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
~~~~~
५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
~~~~~
६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
~~~~~~
७. परमचेतना नेतृत्व
नेतृत्व क्या है? असली नायक कौन है?
एक असली नायक क्या लोगों को कहीं आगे ले जाता है, या वो लोगों को उनतक ही वापस ले आता है?
क्या नेतृत्व प्रचलित कॉर्पोरेट और शैक्षिक ढाँचे से आगे भी कुछ है?
क्या आप या आपका संस्थान सही नेतृत्व की समस्या से जूझ रहे हैं?

जब आम नेतृत्व अपनी सीमा तक पहुँच जाए, तब आमंत्रित कीजिये ‘परमचेतना नेतृत्व’ – एक अनूठा मौका आचार्य प्रशान्त जी के साथ व्यग्तिगत व संस्थागत रूप से जुड़कर जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का।
~~~~~
८. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
~~~~~
९. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
~~~~~~
१०. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
~~~~~~
११. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

~~~~~~
इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998
__

बाहरी प्रभावों से मन डगमगाता क्यों है?

दूर कहीं रोशनी है। वो जहाँ तुम खड़े हो, वहाँ हल्की सी दिखाई दे रही है, उसकी बस एक झलक मिल रही है। तुम उसकी तरफ़ दो तीन कदम बढ़ाओ तो क्या होगा? वो रोशनी थोड़ी और तेज़ होगी। चार कदम और बढ़ाओगे तो क्या होगा? वो रोशनी और तेज़ होगी। पर उसकी ओर कदम बढ़ाना होगा और जैसे-जैसे कदम बढ़ाते जाओगे, वैसे-वैसे तुम्हें यकीन होता जाएगा कि, ‘’हाँ रौशनी सच्ची है।‘’ पर उसकी ओर कदम तो बढ़ाओ। एक कदम से अगले कदम की ताकत मिलेगी। पहला जो कदम है, वो तो डरते-डरते ही रखना पड़ेगा क्योंकि रोशनी हल्की है, डरोगे। पहला जो कदम है, वो तो टटोल-टटोल के रखना पड़ेगा। लेकिन जैसे-जैसे कदम बढ़ाओगे, तुम पाओगे कि प्रकाश बढ़ता जा रहा है, तीव्र होता जा रहा है।
—————–
आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में 29 वां अद्वैत बोध शिविर आयोजित किया जा रहा है।
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश
तिथि: 24-27 फ़रवरी

अन्य जानकारी हेतू सम्पर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661

श्री कुंदन सिंह: +91 – 9999102998
—————–
आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

सफलता की दौड़ में ही असफलता का भाव निहित है

सफ़लता की दौड़ में ही असफ़लता का भाव निहित है।

सवाल ये नहीं है कि, “दौड़ने से सफ़लता मिल भी तो सकती है?”। यहाँ पर बात कार्य-कारण की नहीं हो रही है। बात ये हो रही है कि “आप दौड़ ही क्यों रहे हैं?”, और ये प्रश्न आपके मूल्यों का नहीं है; ये प्रश्न दौड़ने के तथ्य का है — कि कोई कब दौड़ता है।

अपने रास्ते की बाधा तुम खुद हो

जबकी जीवन का नियम यह है कि जब जो होना होता है, होता है तुम्हारे करने की ज़रुरत होती नहीं। लेकिन तुम्हारा सारा ज़ोर इस पर है कि मैं करूंगा और तुम्हारा यह भाव कि ‘मैं करूंगा’ सारे होने को रोक देता है, जाम लगा देता है। जो हो जाए खुद हो जाए तुम्हारे रहते वो हो नहीं पाता और फिर तुम रोते हो कि मेरे काम नहीं होते। तुम्हारे काम इसीलिए नहीं होते कि तुम करने की कोशिश में लगे हो। तुम अपनी कोशिश छोड़ दो तो सारे काम हो जाएंगे। तुम खुद बीच में खड़े हुए हो।
—————-
प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 24 तारीख को अपना 27वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

ईसा मसीह के जन्म दिवस को हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाने का इस बोध शिविर से बेहतर मौका कहाँ हो सकता है!

विश्व भर के आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करने, आचार्य प्रशांत जी के संग समय बिताने, और गंगा किनारे बैठ खुदमें डूब जाने का भी यह एक अनूठा अवसर है।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
__________
अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
—————-
आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न : http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

1 2 3 4 12