आध्यात्मिक प्रतीक सत्य की ओर इशारा भर हैं

बहुत साधारण सी बात है ये, कि उसी में सब कुछ है, और उसके बाहर कुछ नहीं है। जो इस बात को बूझ जाए, वो सब कुछ जान गया।

संतों ने तो बहुत सरल बातें कही हैं। कुछ उन्होंने कभी टेढ़ा-टपरा करा ही नहीं। टेढ़ा-टपरा आदमी का मन कर देता है उसको।

प्रकृति के तीन गुण

ज्ञान वो है जो अज्ञान को काटे।
पर ज्ञान के साथ दूषण ये होता है कि वो अज्ञान को तो काट देता है, लेकिन स्वयं बच जाता है।
गुणातीत होने का अर्थ है कि अज्ञान नहीं रहा, और अज्ञान के बाद अब ज्ञान भी नहीं रहा। अब तो शान्त बोध है।
उसी शान्त, खाली बोध को साक्षित्व कहते है।

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