बीमारी को बीमारी न मानना ही बीमारी है

सामान्य की जो हमारी परिभाषा है, वो बड़ी गड़बड़ हो गयी है। इसलिए हम विद्रोह नहीं कर पाते। विद्रोह उठता भी है, तो हम उसको दबा देते हैं। हम कहते हैं, हर घर में यही तो हो रहा है। और देखो ना, टी वी को देखो, स्कूल को देखो, कॉलेज को देखो, परिवार को देखो, माँ बाप को देखो, उन सबने यही तो बताया है कि ऐसा ही होता है। और ऐसा ही होता है तो मैं होता कौन हूँ, क्रांति करने वाला। मैं होता कौन हूँ, उस जगह से उठ जाने वाला, जो जगह चुभ रही है।

जैसे मुझे चुभ रहा है, ऐसे ही मेरे पिताजी को चुभ रहा था। ऐसे ही मेरे दादा जी को चुभा था। और हमारे परिवार में, जो चुभ रहा हो उससे न उठने की परंपरा है। वो कभी अपनी गद्दी छोड़ के नहीं उठे, जब चुभ भी रहा था, तो मैं क्यों उठूँ? इतना ही नहीं, उन्होंने कभी चुभन को चुभन कहा ही नहीं। उन्होंने कहा, “ये तो फूलों की पंखुड़ियों का दैवीय स्पर्श है। ये काँटा थोड़े ही चुभ रहा है, ये तो पंखुड़ी मुझे सहला रही है। हम अपने ही प्रति क्रूर और असंवेदनशील हो गए हैं। हमें अपनी ही तड़प के प्रति ज़रा भी सद्भावना नहीं है। एक छोटा बच्चा होता है, आप उसको ज़बरदस्ती गोद में ले लें, वो ऐंठेगा और छिटक के दूर हो जाएगा। देखा है आपने? उसको भी अपने स्वार्थ का ख़याल होता है।

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झूठ के दाग

नासमझी में जो सच भी बोला जाए, वो बहुत बड़ा झूठ है।

बिना समझे, सिर्फ डर के कारण या लोभ के कारण, या आदत के कारण, या परम्परा के कारण, अगर तुम सच भी बोल रहे हो तो उसमें सच जैसा क्या है? क्या है सच जैसा? तो समझो, बात को समझो। एक बार समझ गए, तो फिर तुम जो भी बोलोगे वो ठीक होगा। चाहे वो सच हो कि झूठ हो कि क्या हो ,सच-झूठ की परवाह किसको है? बात को समझना ज़रूरी है। नहीं आ रही बात समझ में? या तुमने ये सोचा था, कि मैं बता दूंगा कि नहीं, झूठा-झूठा गंदा, या झूठा-झूठा कड़वा और सच्चा-सच्चा मीठा। ऐसा कुछ नहीं है। तुम्हारे पास सिर्फ तुम्हारी एक चीज़ है, तुम्हारा ध्यान, तुम्हारी समझ।

बात को अगर समझते हो, तो अपने आप जो करोगे, जो कहोगे, वो ठीक ही होगा। तुम्हें परवाह करने की ज़रुरत ही नहीं है कि मैं सच बोल रहा हूँ, कि झूठ बोल रहा हूँ। और भले ही वो कोई संस्था हो, या घर हो, या चौराहा हो, फर्क नहीं पड़ताआचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम:

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जग गए हो, ये कहना बड़ी भ्रान्ति है

जग गए हो, ये कहना बड़ी भ्रान्ति है। कोई जग जाता नहीं है। जगने की प्रक्रिया, सतत चेतना की है; कंटीन्यूअस अवेकनिंग। ‘जग गए हो’, जैसे स्टेटमेंट का

बचपन से देखा सुना, उससे अचानक कैसे हटें?

जग गए हो, ये कहना बड़ी भ्रान्ति है। कोई जग जाता नहीं है। जगने की प्रक्रिया, सतत चेतना की है; कंटीन्यूअस अवेकनिंग। ‘जग गए हो’, जैसे स्टेटमेंट का कोई अर्थ नहीं होता। लगातार जगते रहना होता है। क्योंकि सुलाने वाली ताकतें बहुत हैं।

सुलाने वाली ताकतें बहुत हैं, और लगातार काम कर रही हैं। तो जगना भी लगातार होता है; लगातार। ‘जग गए हो’ जैसा कुछ नहीं है । फिर सो जाओगे ।
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