आत्मा माने क्या?

“स्वात्मा हि प्रतिपादितः” का अर्थ है कि –
‘आत्मा’ वो तत्व है, जिसका विस्तार ‘अहंकार’ और ‘संसार’ हैं।

जब विस्तार सिमट जाता है, तो सिर्फ़ ये तत्व जलता रहता है,
प्रकाशित होता रहता है।
जब ये विस्तार फैल जाता है, तो विस्तार ही विस्तार दिखाई देता है,
तब यह तत्व आसानी से प्रतीत नहीं होता।
 
समेट लो तो ‘आत्मा’, फैला दो तो ‘संसार’।

आशा बचाती है अतीत के कचरे को

जलना स्वभाव-विरुद्ध है।
जो जलता हो उसे फिर, जल ही जाने दो। संघर्ष न करो।
जो सहजता से हो, वही भला है।

जो संबंध कायम रखने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़े,
उस संबंध को ख़त्म हो जाने दो।
जो मंज़िल हासिल करने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़े, संघर्ष करना पड़े,
समझ लो कि वो मंज़िल तुम्हारे लिए नहीं है।

जिसके हुक्म से संसार है

जो कुछ भी महत है, वृहद है, बड़ा है,
वो तुम्हें ‘उसके’ अनुग्रह से ही मिलेगा।
और जो कुछ भी सीमित है, छोटा है, और बंटा हुआ है,
वो तुम्हें तुम्हारी कोशिशों से मिलेगा।

जो कुछ भी मंगलकारक है, आनंददायक है,
वो तो ‘हुक्म’ से ही आएगा।
और जो कुछ भी कष्टदायक है, दुखी कर रहा है, तड़पा रहा है,
वो तुम्हें खुद कर-कर के मिलेगा।

दुःख कहाँ है?

अगर आप हर मोड़ पर दुःख पाते हो, दुःख के नए-नए कारण आपके जीवन में प्रविष्ट होते जाते हैं, तो आपको तलाश करनी पड़ेगी ईमानदारी से कि – “दुःख कहाँ है?”

अन्यथा आप झूठे कारणों को निपटाते जाओगे, उनका निवारण करते जाओगे, हटाते जाओगे, और रोज़ पाओगे कि कोई नया कारण, कोई नई घटना, कोई नया व्यक्ति आ गया है, जिसके कारण आपको दुःख मिल रहा है।

घटनाएँ बदलती रहेंगी, व्यक्ति बदलते रहेंगे, कायम क्या रहेगा? दुःख कायम रहेगा।

फूल-मूल की अभिव्यक्ति

आप जो कुछ भी कर रहे हैं, जैसे भी जी रहे हैं, उसमें क्या आपको कुछ भी ऐसा मिला है, जिस पर परायेपन की छाया न हो? या यह पूछ लीजिये अपनेआप से कि, “क्या मुझे संपूर्ण अकेलेपन का एक भी क्षण उपलब्ध होता है?” वही आपका अपना होता है। सुन्दर, पूर्ण अकेलापन। और वो अकेलापन जगत से भागने वाला नहीं होता है, वो अकेलापन आपकी अपनी पूर्णता का एहसास होता है। जहाँ भी दूसरा मौजूद है, वहीँ आपकी अपूर्णता मौजूद है। नहीं तो दूसरे के लिए जगह कैसे बनती।

और यदि मन और विचारों की भाषा में बात करनी हो, तो पूछ लीजिये अपने आप से कि, “क्या दिन भर में कोई भी क्षण ऐसा उपलब्ध होता है, जब मन पर विचार हावी न हों?” आप कहेंगे, “विचारों का आना-जाना तो चलता ही रहता है, प्रवाह है”। तो मैं कहूँगा, “ठीक, विचारों का आना-जाना तो चलता रहे, तो इतना ही बता दीजिये कि ज़रा भी अवकाश आपको ऐसा उपलब्ध होता है, जब आप विचारों से अनछुए रहें। ठीक, विचारों का आना-जाना चलता रहता है। क्या कभी ऐसा होता है कि आप विचारों से अनछुए रहें?”

नाम-पहचान संयोग मात्र

ये सब एक जोक है, इसको जोक ही मानना| वो एक्टिविटी बस यही बता रही है कि इस चीज़ों के लिए सीरियस हो जाने की कोई आवश्यकता नहीं है| ये बस ऐसे ही हैं, एक्सीडेंटल; बाहर से आईं हैं और बाहर को ही चली जायेंगी| और लड़कियों को तो अच्छे से पता है, बेचारी आज गुप्ता होती हैं, कल अग्रवाल बन जाती हैं| थोड़ी मॉडर्न हो गयी है तो ‘गुप्ता अग्रवाल’ बन जाती हैं|

इशारा किधर को कर रहा हूँ, समझो| ये दी जाने वाली चीज़ें हैं, ये बदल जानी हैं|

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