गुरु और सद्गुरु में क्या अंतर है?

संसार का मतलब ही है कि वहाँ तुम्हें कोटियाँ मिलेंगी, वर्ग मिलेंगे, और विभाजन मिलेंगे।

परमात्मा के दरबार में न श्रेणियाँ हैं, न वर्ग हैं, न विभाजन हैं। वहाँ दो ही नहीं हैं, तो बहुत सारे कैसे होंगे?

दुनिया में बहुत सारी चीज़ें हैं। दुनिया में तुम कहोगे कि फलाने दफ़्तर में एक नीचे का कर्मचारी है, फ़िर उससे ऊपर का, फ़िर उससे ऊपर का, फ़िर उससे ऊपर का।

‘वहाँ’ ऊपर दो नहीं होते, ‘वहाँ’ एक है।

किसी को सभी मूर्ख बनाते हों तो? || आचार्य प्रशांत (2018)

इसी तरीके से, अगर आपको बहुत सारे ऐसे सन्देश आते हों, फ़ोन कॉल आते हों, कि बहुत सारे लोग आपके द्वार पर दस्तक देते हों, जो आपको पता है कि यूँही हैं, सतही, निकृष्ट कोटि के, व्यर्थ का वार्तालाप, व्यर्थ का प्रपंच करने वाले, तो आपको अपनेआप से ये प्रश्न पूछना चाहिये, “उन्हें मुझमें ऐसा क्या लगता है कि वो मेरी ओर खिंचे चले आते हैं?”

क्योंकि बुद्धों की ओर तो वो जायेंगे नहीं।

रूह के राज़ || आचार्य प्रशांत, संत रूमी पर (2017)

आपके माध्यम से तो अब कई अन्य वृक्ष उगने चाहिये।

अब आप पेड़ से टंगे मत रह जाना।

अब आप दुनिया के तानों की, और हमलों की, परवाह मत करने लग जाना।

आचार्य प्रशांत: ये बनना, बिगड़ना, और बदलते रहना

जीवन का नाम ही है – बदलना, बिगड़ना, बनना, सब पुनः-पुनः। आप इस चक्र में कहाँ सम्मिलित हो रहे हैं? आपका इसमें प्रयोजन क्या है? 

आप कहीं और हैं, आप वहीं रहिए। आप इस सब के द्रष्टा और साक्षी भी होने का प्रयास मत करिए। दिख गया तो दिख गया, नहीं दिखा तो कोई बात नहीं। कुछ बहुत अच्छा आपको मिल नहीं जाना है बहुत टूट जाए तो। और कुछ आपका छिन नहीं जाना है, अगर संसार बनता ही रहे तल-दर- तल, परत-दर-परत, मंज़िल-दर-मंज़िल। तो भी

कोई दिन ऐसा नहीं था जब ये खेल चल नहीं रहा था, और कोई दिन ऐसा नहीं होगा जब ये खेल चल नहीं रहा होगा।

आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग: लड़ना तभी सार्थक जब भीतर शान्ति हो

सिर्फ एक ध्यानस्थ आदमी ही प्रेम जान सकता है। वही स्रोत है, वहाँ से ही सब कुछ निकलता है। ये जो लाल खड़े मैदान हैं न, मैदान में बड़ी लड़ाईयाँ होती हैं। लड़ाई में वही खड़ा रह सकता है जो अंदर से शान्त हो।

बाहर की गहरी अशांति वही झेल सकता है जो भीतर से पूर्णतया शान्त हो।

जो भी जीवन में कुछ करना चाहता है, वो जीवन में कुछ नहीं पाएगा क्योंकि उसको लग रहा है जीवन में कुछ करने लायक है। एक दूसरे तरह का आदमी होता है, जो कहता है जीवन में कुछ करना नहीं है, जीवन में होने देना है। प्रवाह, वहाँ भी दिखाई देगा पर वो प्रवाह बिलकुल अलग तरीके का होगा। अब वो अव्यवस्थित को व्यवस्थित बनाने की कोशिश नहीं करेगा, वो उस अव्यवस्था से खेलेगा।

~ आचार्य प्रशांत

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निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं :-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.comपर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग: मन के मोटापे से बचो

कॉलेज, घर, दोस्त, माता-पिता, शिक्षक, शौपिंग मॉल; तुम्हारा संसार यही है, इतना ही है, यही है न?

कोई और होगा जिससे मैं पूछूँ, ‘संसार माने क्या?’, वो शायद बोलेगा, ‘लेबोरेटरी’, यह उसका संसार है।

अगर कोई प्रेम में है और मैं उससे पूछूँ, ‘संसार क्या है’, वो कहेगा ‘मेरी प्रेमिका’।

क्या कोई एक संसार है तुम्हारा?

मन ही संसार है, जैसा तुम्हारा मन वैसा संसार।

अगर तुम वाकई में शांत हो, तुम ऐसी जगहों पर जाओगे ही क्यों जो अशांत हैं?

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