साक्षित्व का वास्तविक अर्थ

जो सोचने की वस्तु हो, उसके बारे में सोचो और जो सोचने की वस्तु नहीं है, उसके बारे में नहीं सोचो, बस यही आध्यात्म है पूरा। जिसके बारे में सोचा जा सकता है, उसके बारे में खूब सोचो पर कृपा करके उसके बारे में मत सोचने लग जाओ, जिसके बारे में सोचना व्यर्थ है। हम उलटे हैं, जिसके बारे में सोचना चाहिये वहाँ हम सोचने से डरते हैं, हम विचार भी तो नहीं करते ताकतवर, पूर्ण, गहरा विचार हम कहाँ करते है? डरते हैं। जहाँ सोचना चाहिये, वहाँ हम सोचते नहीं और जहाँ सोचना मूर्खता है, वहाँ हम खूब सोच का जाल फेंकते रहते हैं।
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संवेदनशीलता क्या है?

संवेदनशीलता का अर्थ ही यह है कि ‘मैं’ बीच में न आए। जहाँ ‘मैं’ बीच में आ जाता है, वहाँ संवेदनशीलता नष्ट हो जाती है।
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गुरु तुम्हें वो याद दिलाता है जो तुम जानते ही हो

श्रद्धा में और जिद्द में यही अंतर है। जिद्द घबराएगी, परेशान हो जाएगी और उसके ऊपर ज़्यादा दबाव डालोगे, तो टूट भी जाएगी। और श्रद्धा को तुम तोड़ नहीं सकते क्यूँकी वो है ही नहीं। तुम उसमें कुछ एसर्ट नहीं कर सकते। तो आप उसको तोड़ नहीं सकते। वो तो हारने को भी तैयार हो जाएगी। वो तब भी जीत जाएगी।

क्यूँकी कुछ क्लेम करने को नहीं है न ख़ास। कुछ सिद्ध करने को है नहीं। वो सारे रास्ते ले लेगी। वो बहते पानी की तरह है, वो इधर भी चल लेगी, वो उधर भी चल लेगी।
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संवेदनशीलता ही वास्तविक सभ्यता है

शब्दों को ही नहीं पढ़ें, उसके भाव को भी पढ़ें। कहने वालों ने कहा है इसीलिए कि, जीवन अपनी कहानी पूरी तरह से कहता है पर मौन में कहता है। और फिर आप में बड़ी संवेदनशीलता चाहिए मौन की आवाज़ सुनने के लिए। पर हमें तो व्यक्त आवाजें भी सुनाई देनी बंद हो गई हैं। हमसे अगर कोई बोले कुछ आहिस्ता, हौले से कुछ बोले, तो हमें कहाँ समझ में आता है। चिल्लाना पड़ता है। चिल्लाना पड़ता है ना? तो मौन तो बिलकुल ही आहिस्ता बोलता है, वो तो फुसफुसाता भी नहीं है। शून्य सामान आवाज़ है उसकी, अनहद नाद है उसका, सुनाई ही नहीं पड़ेगा। तो इसी लिए हमें जीवन की कहानी का कुछ पता नहीं क्यूंकि जो भी सूक्ष्म है, उस पर न तो हमें ध्यान देना आता है, न ही सुनना आता है।
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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पूर्णता मुखर मौन है; तुम्हारी सारी कहानियाँ अपूर्णता की हैं

जब तक भविष्य रहेगा, तब तक हिंसा रहेगी औरआप तब तक अपने केंद्र से ही दुनिया को देखोगे। आप अपने केंद्र से ही अस्तित्व में जो कुछ है ,उसको देखोगे और उसका दोहन करना चाहोगे, शोषण करना चाहोगे। आप कहोगे, ‘’जो कुछ भी है, वो इसलिए है कि मेरे काम आ सके।’’ जंगल क्यों है? ‘’ताकि इसका पैदावार मुझे सुख दे सके।’’ जानवर क्यों हैं? ‘’ताकि मैं उन्हें खा सकूँ और उनसे श्रम ले सकूँ।’’ दूसरे क्यों हैं? ‘’ताकि मैं उनका किसी तरीके से इस्तेमाल कर सकूँ।’’ ये अहंकार का केंद्र रहेगा। आपको इस पर बैठना ही पड़ेगा। जब तक भविष्य है, तब तक अहंकार है। जब तक भविष्य है, तब तक हिंसा है।
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व्यवहार नहीं, वास्तविकता

विचार वास्तविकता का विकल्प बन जाता है। ये ही तो हम करते हैं न अपनी कल्पनाओं में? जो हम वास्तविकता में नहीं कर पाते, हम उसकी कल्पना करना शुरू कर देते हैं। ये ही है न? विचार वास्तविकता का विकल्प बन चुका है। तुम्हारी जो ऊर्जा सीधे कार्य में निकलनी चाहिए थी, वो ऊर्जा फ़ालतू ही कल्पना करने में जा रही है। ये उस ऊर्जा का विरूपण है।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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