आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग: क्या ‘मैं’ से मुक्ति संभव है?

तुम किसी भी मुद्दे को, दुनिया को, किसी भी व्यक्ति को सिर्फ देखते कहाँ हो? तुम तो उसे एक दृष्टिकोण ले कर के देखते हो न? कि ‘मैं ऐसा हूँ’, तो मैं इस बात को ऐसे देखूँगा, ‘मैं हिन्दू हूँ’ तो मैं मंदिर को ऐसे देखूँगा, और चूँकि ‘मैं हिन्दू हूँ’, तो मैं मस्जिद को ऐसे देखूँगा।

तुम सिर्फ देख कहाँ पाते हो शुद्ध रूप से?

तुम्हारे देखने में तो मिलावट रहती है न हमेशा ‘मैं कुछ हूँ’?

विरही मन एक ही दिशा भागता है, अंतर्दिशा

विक्षिप्त आदमी की पहचान यही है कि वो दस तरफ दौड़ेगा, पागल को कभी देखा है, नहीं चल पाता सीधी राह। आप भी अगर पाते

अष्टावक्र-जनक महासंवाद

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आवेदन भेजने हेतु ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com पर

दिनांक: 7 चुनिंदा दिवस 6 अप्रैल से 24 अप्रैल के बीच

समय: सायं 7 बजे से 9 बजे

स्थान: अद्वैत बोधस्थल: तीसरी मंजिल, जी-39, सेक्टर-63, नॉएडा

श्रृंखला का समय: 840 मिनट

अन्य जानकारी हेतु संपर्क करें:

श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

दुनिया से प्रभावित क्यों हो जाता हूँ?

मन की एक स्थिति वैसी भी हो सकती है कि जिसमें कोई विषय उसके लिये महत्वपूर्ण ना रह जाए। मन अपने आप में समा जाए। मन कहे जितने भी विषय हैं, उन सबकी प्रकृति एक है; वो आते हैं जाते हैं। मुझे उनमें से कोई भी महत्वपूर्ण लगता नहीं क्योंकि जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, वो मेरे भीतर ही है। ना अच्छा महत्वपूर्ण है, ना बुरा महत्वपूर्ण है; जो महत्वपूर्ण है वो हमने पा लिया है, तो अब प्रभावित क्या होना।

अब पूरा खेल तुम्हारे सामने चलता रहेगा और तुम उसके मध्य में अनछुए से बैठे रहोगे। तुम्हारे चारों तरफ़ जैसे नदी बह रही हो और तुम उस नदी के केंद्र में बैठी हो और पानी तुम्हें स्पर्श ना कर पा रहा हो। ऐसी स्थिति हो जाएगी।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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निकटवर्ती को ही हाथ बढ़ा कर सहारा दिया जा सकता है

दुनिया तुम्हें सिखाती है कि तुम कुछ बने तब, जब तुम्हें जटिल होना आया। दुनिया ने तुम्हें जो भी कुछ सिखाया है, उसने तुम्हें जटिलता की ओर अग्रसर किया है पर जीवन में तुम कुछ तब हुए जब तुमने अपनी सरलता पुनः प्राप्त की। बड़ा अंतर है। समाज तुम्हें कुछ तब मानेगा, जब तुम खूब जटिल हो जाओगे पर जीवन तुम्हें कुछ तब ही मानेगा जब तुम एक दम सरल हो जाओगे। फिर ॐ भी समझ में आएगा, प्रेम भी समझ में आएगा, प्रज्ञान भी समझ में आएगा और ब्रह्म भी समझ में आएगा।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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