प्रेम बाँटना ही प्रेम पाना है

प्रेम क्या है? प्रेम है: मन का शांत हो जाना, स्रोत के समीप आना। मन हमेशा शान्ति की ओर आकर्षित रहता है, इसी आकर्षण को प्रेम कहते हैं। मन हमेशा खिंचा चला जाता है, किसी की तरफ़, उसी को प्रेम कहते हैं। और किसकी तरफ़ खिंचता है? शान्ति की तरफ खिंचता है। मन शान्ति ही चाहता है , हमेशा। जैसे-जैसे मन शांत होता जाता है, वैसे-वैसे आपका कुछ पकड़ के रखने का जज्बा ख़त्म होता जाता है। जो कुछ भी आपने पकड़ के रखा होता है, वो आप छोड़ने लग जाते हैं। वो आपके माध्यम से बँटना शुरू हो जाता है – ये प्रेम है। और जैसे-जैसे आप छोड़ते जाते हैं, मन और शांत होता जाता है। आपके छोड़ने की क्षमता बढ़ती जाती है। आप दिए जा रहे हो, और देने में ही आपका उल्लास है। आपका मन ही नहीं करता, कंजूस की तरह पकड़ के रखने का।
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झूठी धारणाओं से भरा यदि मन, झूठे सम्बन्धों से भर जाएगा जीवन

‘अपना’ आप किसको बोल रहे हो? जब तक आप शरीर से जुड़े रिश्तों को ‘अपना’ बोल रहे हो, तब तक आप ये कह रहे हो कि मेरा ‘अपना’ शरीर ही तो है। अगर शरीर से जुड़े रिश्तों में अपनापा है, तो आपका ‘अपना’ क्या हुआ सर्वप्रथम? शरीर।

तो फ़िर आपकी परिभाषा क्या हुई:

मैं कौन?

मैं ‘देह’!

और अगर आप देह हो, तो आप कष्ट से बच सकते कैसे हो?

मूर्ति द्वार है अमूर्त का

संगति ही सब कुछ है – और मीरा ने कर ली है कृष्ण की संगति। तुम देखो तुमने किसकी संगति करी है?

मन तो प्रभावों के संकलन का नाम है, जैसे माहौल में उसे रखोगे वैसा हो जाएगा; तुम देखलो कि तुमने उसे कैसे माहौल में रखा है?

मीरा को कृष्ण के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता था, दिन-रात वो कृष्ण के साथ ही रहती हैं। तुम देखो कि तुम्हारी आँखों के सामने किसका चित्र घूमता है हर समय? सुबह उठते हो तो कौन-से भगवान की शक्ल दिखाई देती है? आँख खोलते हो तो सामने कौन-सी देवी मौज़ूद रहती है?

जिनकी शक्ल दिन-रात देख रहे हो वैसे ही हो जाओगे।

शिष्य कौन?

जो दिन-प्रतिदिन की छोटी घटनाओं से नहीं सीख सकता वो किसी विशेष आयोजन से भी सीख पाएगा, इसकी संभावना बड़ी कम है|

बुद्धिमान वही है जो साधारणतया कही गयी बात को, एक सामान्य से शब्द को भी इतने ध्यान से सुने कि उससे सारे रहस्य खुल जाएँ |

समाज द्वारा संस्कारित मन निजता से अनछुआ

तुम जब किसी से मिलते हो, तो उससे व्यक्ति की तरह कहाँ मिलते हो| तुम उससे ऐसे मिलते हो कि “ये तो मेरा भाई है, कि पति है, कि यार है, या कोई अनजाना है, या माँ है”| आदमी और आदमी कहाँ मिल पाते हैं?

एक आदमी होता है और दूसरा आदमी होता है, और इन दोनों से बहुत ज़्यादा ताक़तवर एक समाज, एक मालिक बैठा होता है| जो इस बात को फ़ैसला कर रहा होता है कि ये दोनों आपस में कैसे सम्बंधित होंगे|

तो जो संबंध हैं, वो दो व्यक्तियों के बीच में तो कभी होते ही नहीं हैं| वो तो दो धारणाओं के बीच में होते हैं, दो मशीनों के बीच में होते हैं| दो मशीन आपस में पूर्व-निर्धारित तरीके से कोई संबंध स्थापित कर लेती हैं| निश्चित रूप से ये इंडिविजुएल्टी तो नहीं है| और इसी बात को आप समाज की महत्ता बोलते हो, और समाज का आविष्कार भी इसीलिए हुआ है|

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