सीमाओं से बंधे नहीं न तोड़ने की तलब, सीमाओं की बात क्या हमें असीम से मतलब

“हद चले सो मानवा, बेहद चले सो साध। हद बेहद दोनों तजे, ताका मता अगाध”।। ~ संत कबीर वक्ता: आदमी का जीवन लगातार सीमाओं में बीतता

भक्ति माने क्या?

तुम्हारे भीतर जब तक वो मौजूद है जो कुलबुला रहा है कि, ‘मुझे मालिक होना है मुझे मालिक होना है’ तब तक तो तुम दास ही रहोगे।

दासता से मुक्ति ही इसी में है कि परम के दास हो जाओ। तुम जाकर उसके पाँव में गिरोगे, वो तुम्हें गले से लगा लेगा— मिट गई दासता।

और जब तक तुम उसके पाँव में गिरते नहीं तब तक तुम्हारे हज़ार मालिक रहेंगे और क्षुद्र से क्षुद्र की गुलामी करोगे।

प्राण क्या हैं?

वो जादू जो मिट्टी में प्रेम उतार देता है, उसे ‘प्राण’ कहते हैं।
इसीलिए उपनिषद् कहते हैं, “प्राण ही ब्रह्म है।”

‘वो’ कुछ ऐसा कर देता है जो हो नहीं सकता था।
राख हो जाना है आपको, और राख से ही आए हो आप।
पर इस राख की उड़ान देखो, इस राख की समझ देखो, इस राख की गहराई देखो – ये ‘प्राण’ कहलाती है, ये ‘प्राण’ है।

जीवन तभी है जब उसमें प्राण हों।
और ‘प्राण’ का मतलब साँस मत समझ लीजिएगा कि साँस चल रही है, तो मैं प्राणी हुआ।
आप प्राणवान केवल तब हैं जब आपके जीवन में ‘वो’ मौजूद है, जो आपके जीवन को जीने के क़ाबिल बनाता है,
अन्यथा आप अपने आपको मुर्दा और निष्प्राण ही मानें।

गुरु तुम्हारी बीमारी के कारणों का कारण जाने

अब आप दावा तो करते हो – “शिव, शिव, शिव, शिव, शिव” –
और हाथ-पाँव ऐसे हैं जैसे लकवा मारा हो, कोई शक्ति नहीं।
तो बात सीधी है कि आप ‘शिव’ को नहीं जानते।

‘शिव’ को जानते होते, तो जीवन में ‘शक्ति’ होती।
‘शिव’ को जानने का अर्थ यही है कि – चींटी का इस्तेमाल करके बड़ी चट्टानें हिला दूँगा।
यही है मन को समझना, यही है गुरु का उपाययुक्त होना कि –
चींटी का इस्तेमाल करता है, और बड़ी चट्टानें हिला देता है।

यही है ‘गुरु’।

निर्मलता की गहरी अभिलाषा ही तुम्हें निर्मल करती है

स्पष्टता की, आनंद की, बारिश हो रही होगी, और तुम कोरे के कोरे खड़े होगे।
प्रेम की नदी तुम्हारे सामने बह रही होगी, और तुम उतरने से इनकार कर दोगे।
‘साबुन’ तुम्हारे हाथों में होगा, और तुम गंदे, मैले-कुचैले घूम रहे होगे।
क्योंकि जल नहीं दिया तुमने उस साबुन को, प्रयोग नहीं किया तुमने।

‘शब्द’ तो संत दे सकता है तुमको, श्रवण तक तो वो तुम्हें ले आएगा,
मनन तुम्हें ही करना है, निधिध्यासन तुम्हें ही करना है।
वो तो इतना ही कर सकता है कि तुम्हें एक अनुकूल वातावरण दे दे,

‘राम’ नाम तुम्हारे कानों तक पहुँचा दे, पर आगे की यात्रा तो तुम्हारी है न।

मुक्ति का पहला चरण – शरीर का सहज स्वीकार

जो शरीर को दबायेगा, शरीर उसके ऊपर छा जायेगा।
उसके रेशे-रेशे से, बस शरीर आवाज़ देगा, क्योंकि शरीर को तुम दबा सकते नहीं।
फिर शरीर इधर से, उधर से, हज़ार तिकड़में कर के, अपने आप को अभिव्यक्त करेगा।

जो जगह शरीर को नहीं लेनी चाहिये, उस जगह पर भी शरीर जा कर के बैठ जायेगा।
शरीर तुम्हारी पूजा भी बन जायेगा, शरीर तुम्हारा प्रेम बन जायेगा,
यहाँ तक कि तुम्हारा मोक्ष भी शरीर बन जायेगा।

जिन्होंने शरीर को खूब दबाया होता है, वो जब मोक्ष की भी कल्पना करते हैं,
तो यही सोचते हैं कि हम ऐसे ही कहीं और अवतरित हो जायेंगे।
“हमें मोक्ष मिल गया, अब हम ऐसे ही किसी और लोक में पहुँच जायेंगे, सशरीर।”

शरीर से मुक्ति चाहते हो, तो शरीर को ‘शरीर’ रहने दो।
जिन्हें शरीर से मुक्ति चाहिये हो, वो शरीर के दमन का प्रयास बिल्कुल न करें।
जिन्हें शरीर से ऊपर उठना हो, वो शरीर से दोस्ती करें।
शरीर से डरें नहीं, घबरायें नहीं।

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