न चिंता न चाहत, स्वभाव तुम्हारा है बादशाहत

ये जो मुंह का लटकाना है, इसको समझलो ये सज़ा है। कोई न कोई तो रहा होगा जिसने प्रेम से समझाया होगा। कहीं से तो आवाज़ आई होगी कि “मान जाओ। ” जब नहीं माने, करली अपनी, तो फिर मिलती है सज़ा। और उससे बच तो पाते नहीं। कोई व्यक्ति मारता है, तो शिकायत भी कर पाते हो, परिस्थितियाँ ऐसा थपेड़ा देती हैं कि शिकायत भी नहीं कर पाते। पर उनके पंजों के निशान गाल पर ज़रूर नज़र आते हैं। अब किसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराओगे? अब बस यही बोल पाते हो, “अरे! किसमत खराब है। मैं क्या करूँ? मेरे साथ ऐसा हो गया। ”
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आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम

1.) अद्वैत बोध शिविर
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2.) आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स
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3.) बोधसत्र का सीधा ऑनलाइन प्रसारण
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4.) आचार्य जी से निजी साक्षात्कार
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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जो सुख साधु संग में

कबीर को और कौन सा राम मिलेगा, जब तक कबीर, ‘कबीर’ है, तब तक अनिर्वाच्य, अदृश्य, कालातीत, निराकार, अरूप राम जैसा कुछ हो नहीं सकता, और यदि ऐसा कुछ है भी तो वो भी मात्र मन के लिए शब्द भर है| एक कल्पना- उस कल्पना को न तुम खा सकते हो, न ओढ़ सकते हो, न पहन सकते हो, न उसमें कोई रस है| वो कल्पना तुम्हें जीवन नहीं दे पाएगी| निराकार, निर्गुण तुम्हें कुछ नहीं दे सकता| उसकी कोई उपयोगिता नहीं है|
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आचार्य प्रशांत के साथ 26वां अद्वैत बोध शिविर आयोजित किया जा रहा है।

दिनांक: 26-29 नवम्बर
स्थान: शिवपुरी, ऋषिकेश, उत्तराखंड

आवेदन हेतु ई -मेल भेजें: requests@prashantadvait.com

सीट सीमित हैं।
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

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साधना के बाह्य प्रतीकों का आंतरिक अर्थ

संतों का काम हमेशा यही रहता है कि—तुम्हें बताएं कि तुम जो सोच रहे हो, जिस चीज़ को तुमने पकड़ रखा है वो प्राथमिक नहीं है। तुम किसी हल्की चीज़ को पकड़ कर के बैठे हो और असली को चूकते जा रहे हो।
आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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Spirituality on Streets
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When do you call someone as Spiritual?
Is Spirituality about reading scriptures and gaining knowledge?
Or it is about practicing Meditation techniques?
Have you ever seen a Spiritual man fighting on the streets? Let’s learn the Real Essence of being Spiritual!
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Discourse by Acharya Prashant
Day and Date: Sunday, 28th August 2016.
Venue: Maharishi Ramana Kendra, 8 Institutional Area,
Near Sai Mandir, Lodhi Road, Delhi
Time: 11:00 a.m.

बोध और परितोष

सारा जो बोध-साहित्य है, बस वो यही है कि अंततः तुम चाहते ही यही हो कि थम जाऊँ, तो थम ही जाओ ना! दौड़ क्यों रहे हो?

जो जिस कारण भी दौड़ रहा है, क्यों दौड़ रहा है? कि कभी रुक सके|

इसीलिए दौड़ रहा है ना? जब रुकना ही ध्येय है, तो रुक ही क्यों नहीं जाते?

तुम रुक इसीलिए नहीं जाते क्योंकि तुमसे कहा गया है कि ‘रुकना आगे है’| पर जाननेवालों ने तुम्हें ये समझाया है कि आगा-पीछा कुछ होता नहीं| जो है, वो यही है| रुकना है तो तत्क्षण रुको! इसी पल रुको! आगे सिर्फ आशा है और पीछे सिर्फ़ यादें हैं| रुकना या होना बस इसी पल है|

अपने ऊपर भरोसा क्यों नहीं है?

बात सिर्फ़ आत्मविश्वास की नहीं है । ‘हमें विश्वास ही नहीं है । हमें किसी भी व्यक्ति पर, चीज़ पर, घटना पर, किसी भी बात के होने पर यकीन ही नहीं है । हमें यह भी ठीक-ठीक यकीन नहीं है कि हमारे पाँव-तले ज़मीन है कि नहीं है ।

यह सुनने में अतिश्योक्ति लगती है, पर बात ऐसी ही है । तुम जिन भी बातों पर बड़ा गहरा यकीन करते हो, कोई आकर, कुछ भारी और तीख़े तर्क देकर, उन सब यकीनों को हिला सकता है । तुम्हारे पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जो जड़ से उखाड़ा न जा सकता हो ।

संचय और डर

हम क्यों इकट्ठा करना चाहते हैं, जानते हो?

हमें लगता है कोई अनहोनी घट जाएगी कल| आगे पता नहीं क्या हो तो पहले से इंतज़ाम करके रख लो|

दुनिया में और कोई भी नहीं है जो इतना डरा हुआ हो| अस्तित्व में कोई भी इतना ज़्यादा खौफ़ज़दा है ही नहीं जितना इंसान है| सब को भरोसा है; सबको एक आंतरिक भरोसा है कि “जो भी होगा चल जायेगा काम”| उन्हें सोचने की जरूरत ही नही पड़ती |

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