ये वादे कभी पूरे नहीं होते

लाओ त्सू ने बड़े मज़े में इस बात को बोला है,
“जब नैतिकता ख़त्म हो जाती है, तो नैतिकता का प्रशिक्षण शुरू हो जाता है।”

नैतिकता का प्रशिक्षण इस बात का पक्का सबूत है कि नैतिकता ख़त्म है।
जब प्रेम ख़त्म हो जाता है, तो प्रेम की बातें शुरू हो जाती हैं।
और प्रेम की बातें इस बात का पक्का सबूत हैं कि प्रेम ख़त्म है।
जब धर्म ख़त्म हो जाता है, तो धार्मिक शिक्षा शुरू हो जाती है।
जब ईमानदारी ख़त्म हो जाएगी, तो ईमानदारी के नियम कायदे बना दिए जाएँगे।

मन जिसका विरोध करता है, उसी का नाम दुःख रखता है

दुःख दिक्क़त तब देता है, जब उसका विरोध करो।
सुख भी नर्क तब बन जाता है, जब उसकी इच्छा करो।
दुःख को यदि विरोध आप न दें, तो क्या वो वास्तव में कोई गड़बड़ बात होगी?

दुःख, ‘दुःख’ क्यों है? क्योंकि आपके भीतर कोई है, जो उसे नहीं चाहता।
जब मैं कह रहा हूँ कि दुःख को गहराई से अनुभव करो, तो मैं कह रहा हूँ कि उसका विरोध करो ही मत।

वो जो भीतर बैठा है, जो दुःख को रोकता है और सुख को आमंत्रित करता है, उसको हटाओ।

तुम्हारे कर्म ही बताएंगे कि तुम कौन हो

मूलतः आप पुरुष हैं, और पुरुष का स्वभाव कर्म नहीं है, बोध है।
यही कारण है कि ज्ञानमार्ग आपके अपने स्वभाव के ज़्यादा क़रीब है,
क्योंकि कर्म है प्रकृति में। कर्म है प्रकृति में, कर्म है हाथों में, कर्म है मन में।
बोध है आत्मा में, और आप वही हैं, आप वही हैं।

कर्म का भी उद्धेश्य यही है कि आप अपने ज्ञान-रूप को पहचान लें।
पर अगर कर्म अपनेआप में बस एक चक्र बन गया है, वो ज्ञान की तरफ़ नहीं ले जा रहा,
तो वो कर्म फ़िज़ूल है।

आप सुबह-शाम करते होंगे जो भी करते होंगे,
उससे अगर आपका भीतर का दिया नहीं जल रहा,
तो वो कर्म फ़िज़ूल है।

सोच- सोच कर देखा तो क्या देखा

जहाँ भी ऑब्जेक्ट होगा, जहाँ भी विषय होगा, वहाँ पर उसे देखने वाला होगा।
एक केंद्र होगा, जहाँ से देख रहे हो।
ऑब्जेक्ट (विषय) है, तो सब्जेक्ट (व्यक्ति) तो होगा।

और वो सब्जेक्ट हमेशा कौन होता है? अहंकार।
अपने ही सन्दर्भ में हम दुनिया को देखते हैं।

तो वास्तव में तभी देखा, जब न रूप दिखा, न नाम दिखा, न आकार दिखा।

निर्मलता की गहरी अभिलाषा ही तुम्हें निर्मल करती है

स्पष्टता की, आनंद की, बारिश हो रही होगी, और तुम कोरे के कोरे खड़े होगे।
प्रेम की नदी तुम्हारे सामने बह रही होगी, और तुम उतरने से इनकार कर दोगे।
‘साबुन’ तुम्हारे हाथों में होगा, और तुम गंदे, मैले-कुचैले घूम रहे होगे।
क्योंकि जल नहीं दिया तुमने उस साबुन को, प्रयोग नहीं किया तुमने।

‘शब्द’ तो संत दे सकता है तुमको, श्रवण तक तो वो तुम्हें ले आएगा,
मनन तुम्हें ही करना है, निधिध्यासन तुम्हें ही करना है।
वो तो इतना ही कर सकता है कि तुम्हें एक अनुकूल वातावरण दे दे,

‘राम’ नाम तुम्हारे कानों तक पहुँचा दे, पर आगे की यात्रा तो तुम्हारी है न।

संत वो जो तुम्हें विशुद्ध तुम ही बना दे

जितनी बार तुम उचित दिशा में क़दम उठाओगे,
उतनी बार आगे की राह और आसान हो जाएगी।
तुम्हारा एक-एक क़दम निर्धारित कर रहा है कि
अगला क़दम आसान पड़ेगा, या मुश्किल।

केंद्र की ओर जो भी क़दम उठाओगे,
वो अगले क़दम का पथ प्रशस्त करेगा।
और केंद्र से विपरीत जो भी क़दम उठाओगे,
वो केंद्र की ओर लौटना और मुश्किल बनाएगा।

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