हृदय का अर्थ क्या है ?

क्यों आपको खुला आसमान भाता है?
पक्षी की उड़ान क्यों आपको निस्तब्ध कर जाती है?
इनका कोई कारण नहीं है।

चलते-चलते अचानक ठिठक के खड़े क्यों हो जाते हैं?
अनायास प्रेम क्यों पकड़ लेता है आपको?

मन सोच-सोच के भी कुछ पता नहीं लगा पाएगा।

दुनिया की सारी सहूलियतें मिली रहें, आपको लेकिन फिर भी आजादी क्यों प्यारी होती है?
मन इसका कोई कारण नहीं जान पाएगा।

यह ‘ह्रदय’ है।

जहाँ मन आत्मस्थ हो जाए, मात्र वही जगह मंदिर कहलाए

कौन है ‘संत’? ‘संत’ वही है, जिसको देख कर परमात्मा की याद आए।
कौन है ‘महात्मा’? वही जो जब सामने आए तो ये विश्वास-सा होने लगे कि परमात्मा होता होगा।

इसका होना इस बात का प्रमाण है कि परमात्मा होता होगा।
अगर परमात्मा ना होता, तो ये नहीं हो सकता था – बस वही महात्मा है, वही संत है।

गुरु किसको मानें?

गुरु होना तो बड़ी महीन, बड़ी दैवीय, बड़ी आध्यात्मिक, बड़े प्रेम की घटना है।
बिल्कुल दिल से दिल का नाता है।

गुरु से नियम-क़ायदे का नहीं, आँसुओं का रिश्ता होता है।
वहाँ रिश्ता ही तब बनता है, जब आँसू बिल्कुल सफ़ाई कर देते हों।
जैसे दिल की ज़मीन पर आँसुओं का पोंछा लगाया हो, इतनी सफ़ाई होनी चाहिए।

वहाँ चालाकी और चतुराई नहीं हो सकती, वहाँ धोखेबाज़ी नहीं हो सकती।

जो छोटे मसले नहीं संभाल सकता, वो बड़े क्या संभालेगा

मन ऐसा रखो जिसमें लालसा ही न उठे। 
ज़िन्दगी ठीक रखनी पड़ती है,
इसीलिए सात्विक जीवनशैली बहुत ज़रूरी है।

सात्विक जीवनशैली वही होती है जिससे विचार अपनेआप शाँत रहते हैं। 

तुम जितना गन्दा खाना खाओगे, तुम जितने गन्दे तरीकों की बात सुनोगे, दृश्य देखोगे, साहित्य पढ़ोगे,
उतना तुम्हारे मन में कुत्सित विचार उठेंगे।

मेरे लिए कौन सी दिशा सही है?

देखो मन का जो पूरा प्रशिक्षण है, वो ये है कि दो दिशाओं में जाओ – या तो फ़ायदे की, या नुकसान के विपरीत।
मन का पूरा प्रशिक्षण ही यही है। और इन्हीं तरीकों से तुम्हें नियंत्रित किया जाता है।

तुम कहीं को चलोगे, मन कहेगा, “वहाँ मत जाना, वहाँ…”

सभी श्रोतागण: नुकसान है।

वक्ता: कहीं और को चलोगे, तो मन कहेगा, “वहाँ ज़रूर जाओ, वहाँ…

सभी श्रोतागण: फ़ायदा है।

वक्ता: मैं तुमसे कह रहा हूँ कि इन दोनों बातों को अस्वीकार कर दो। इन दोनों ही बातों को अस्वीकार कर दो।
हाँ, कोई तीसरी आवाज़ सुनाई दे, जो तुमसे कहती हो, “जाओ,” लेकिन ये न बता पाती हो कि क्यों जाओ,
क्या फ़ायदा या क्या नुकसान है, तो उस आवाज़ के साथ हो लो।

उस आवाज़ का समर्थन करो।

सत्य अकस्मात उतरता है

उसने आपसे इतना ही माँगा था कि जब जीवन खड़ा हुआ है, मौका प्रस्तुत है, तो आप पीछे मत हटियेगा।
उसने तो बस इतना ही माँगा आपसे कि – “मैं तुम्हारे सामने आ गया हूँ अब पीछे मत हटना।”

तो आप बस वैसे ही रहे आइये कि – “जब तू सामने आएगा, हम हटेंगे नहीं।”
बस वैसे रहे आइये।

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