केंद्र पर है जीवन शांत, सतह पर रहे तो मन आक्रांत

पूर्णता की लीला है कि उसमें से अपूर्णता का भाव उदित होता है और ये जो अपूर्णता का भाव है, ये फिर पूरे संसार को नचाता है- ‘तीन लोक नाती ठगे’। ये पूरे संसार की रचना करता है; ये पूरे संसार को फिर घुमाता-फिराता रहता है। सारा चक्र इसीलिए चल रहा है कि मैं किसी तरीके से एक साथी पा लूँ जो मेरे भीतर के खालीपन को भर दे। वो साथी कोई भी हो सकता है, कोई विचार हो सकता है, चीज़ें, वस्तुएँ, रुपया-पैसा, व्यक्ति, कुछ भी हो सकता है, पर हमारी पूरी तलाश बस यही रहती है कि किसी तरीके से भीतर की रिक्तता भर जाए।

‘तीन लोक नाती ठगे, पंडित करो विचार’
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

गगन दमदमा बाजिया:
http://tinyurl.com/AcharyaPrashant-Gagan
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जो तुम्हारे विचार हैं वही तुम हो

एक रेपिटीशन ऐसा भी हो सकता है जिसमें मैं सतर्क हो कर, जागरूक होकर
अपने ही जालों को काटने की कोशिश कर रहा हूँ।
वो कोशिश भी निरंतर है, इसी कारण रेपिटिटिव (पुनरावृत्ति) लगती है।

ठीक वैसे ही जैसे कोई रोज़ सफाई कर, तो सफ़ाई रेपिटिशन है,
पर वो सफ़ाई भी रोज़ चाहिए क्योंकि धूल भी रोज़ जम रही है।
और वो अंधी सफ़ाई नहीं है, कि अँधा होकर झाड़ू लेकर कुछ इधर-उधर कर दिया।

जहाँ गन्दा है, वहाँ साफ़ कर रहे हैं। उस सफ़ाई में एक चेतना है, जानने का भाव है।
तो देखने में वो रेपिटिशन ही लगेगा, पर है नहीं, कुछ और ही चल रहा है।
दिखने में एक-सी ही बात लगेगी, पर है नहीं।

संवेदनशीलता क्या है?

सेंसिटिविटी का अर्थ ये है कि – मन की जो स्थूल, ज़ोर की आवाजें होती हैं,
उनको ज़रा चुप रहने को बोल देना, ताकि सूक्ष्म सुनाई दे सके।
सेंसिटिविटी का अर्थ ही यही होता है – सूक्ष्म आवाज़ें सुन पाना।

आप कब बोलोगे कि – “ये रिकॉर्डर सेंसिटिव है?”

श्रोता १: जब हल्की-सी आवाज़ भी रिकॉर्ड हो रही हो।

वक्ता: जब वो हल्की-सी, सूक्ष्मतम आवाज़ को भी सुन ले – यही सेंसिटिविटी है।
और सूक्ष्मतम आवाज़ को तब सुन पायेगा ना जब पहले भारी,
कर्कश आवाज़ों से उसको मुक्ति मिले।

वो कर्कश आवाज़, वो भारी आवाज़, अहंकार की आवाज़ है।
ज्यों ही वो नहीं रहती, त्यों ही आपको सूक्ष्म आवाजें सुनाई देने लग जाती हैं।

प्राण क्या हैं?

वो जादू जो मिट्टी में प्रेम उतार देता है, उसे ‘प्राण’ कहते हैं।
इसीलिए उपनिषद् कहते हैं, “प्राण ही ब्रह्म है।”

‘वो’ कुछ ऐसा कर देता है जो हो नहीं सकता था।
राख हो जाना है आपको, और राख से ही आए हो आप।
पर इस राख की उड़ान देखो, इस राख की समझ देखो, इस राख की गहराई देखो – ये ‘प्राण’ कहलाती है, ये ‘प्राण’ है।

जीवन तभी है जब उसमें प्राण हों।
और ‘प्राण’ का मतलब साँस मत समझ लीजिएगा कि साँस चल रही है, तो मैं प्राणी हुआ।
आप प्राणवान केवल तब हैं जब आपके जीवन में ‘वो’ मौजूद है, जो आपके जीवन को जीने के क़ाबिल बनाता है,
अन्यथा आप अपने आपको मुर्दा और निष्प्राण ही मानें।

गुरु तुम्हारी बीमारी के कारणों का कारण जाने

अब आप दावा तो करते हो – “शिव, शिव, शिव, शिव, शिव” –
और हाथ-पाँव ऐसे हैं जैसे लकवा मारा हो, कोई शक्ति नहीं।
तो बात सीधी है कि आप ‘शिव’ को नहीं जानते।

‘शिव’ को जानते होते, तो जीवन में ‘शक्ति’ होती।
‘शिव’ को जानने का अर्थ यही है कि – चींटी का इस्तेमाल करके बड़ी चट्टानें हिला दूँगा।
यही है मन को समझना, यही है गुरु का उपाययुक्त होना कि –
चींटी का इस्तेमाल करता है, और बड़ी चट्टानें हिला देता है।

यही है ‘गुरु’।

दूसरे को अपना बोझ मत बनने दो

ये पूरा जो सवालों का जंगल है ना, हममें से कोई नहीं है जो इसे साफ़ कर सके।
सिर्फ़ एक बोध है जो इसको बिल्कुल हटा देगा, वो ये कि – दूसरे है नहीं।
सब एक आत्मा का प्रकाश है।

जब तक तुम इस बोध में जीना नहीं शुरू करते, जब तक ‘दूसरे’ हैं,
जब तक संसार अपने पूरे वैविध्य के साथ तुम्हारे सामने खड़ा है,
तब तक ये सवाल बाकी ही रहेंगे और बढ़ते ही जायेंगे। कहा न कि पूरा जंगल है।

इस जंगल के तुम कितने पत्ते, डाल, टहनियाँ काटोगी?
इस पूरे जंगल के मूल में जाओ। ‘दूसरे’ हैं नहीं, अपने मन पर ध्यान दो, उसको आत्मा में स्थापित रखो।
जब तक ‘दूसरे’ हैं, तब तक इस तरह के सवाल बचे रहेंगे, और परेशान रहोगी।

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