आचार्य प्रशांत, श्री अष्टावक्र पर: सत्य-न एक, न अनेक

आपने कभी ये सवाल नहीं उठाया अपने आप से की इस बात को महत्वपूर्ण क्यों नहीं मन जाता की चार की ख़ोज कहाँ हुई थी? और आठ की, नौ की खोज कहाँ हुई थी? अगर सब संख्याएँ हैं, तो सब की खोजों को मत्वपूर्ण माना जाना चाहिए न। फिर तो किसी इतिहास की किताब में ये भी दर्ज होना चाहिए की तीन किसने खोजा था? पर नहीं, एक, दो, तीन तो मंद-बुद्धि भी खोज लेंगे। शून्य खोजना बड़ी दूसरी बात है।

इसी कारण यह कह देना कि सत्य एक है, ईश्वर एक है, अष्टावक्र के मुताबिक मंद-बुद्धियों का काम है। तो फिर तुमने वही कर दिया जैसे तुम केले गिनते हो कि एक, दो, तीन, वैसे ही तुमने ईश्वर गिन लिए की एक है। तुम्हें किसी दुसरे आयाम में जाना पड़ेगा। संसार का स्रोत उसी आयाम में नहीं हो सकता जहाँ संसार’ है। तो वहाँ पर कोई संख्या प्रयोग किए जाने लायक नहीं है। वहाँ पर कोई संख्या मान्य ही नहीं है। एक प्रकार से अवैध है उसको किसी भी प्रकार की धारणा में बांधना। बात गलत हो जाएगी।

~ आचार्य प्रशांत

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निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं :-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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८. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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९. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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१०. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.comपर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998

मुक्ति माने क्या?

कृष्ण तक पहुँचने के यदि नियम हो सकते, फिर तो नियम कृष्ण से बड़े ही हो जाते।

जिस जगह तक पहुँचने का रास्ता तुम तैयार कर लो, वो जगह भी तुम्हारे ही द्वारा तैयार की गई होगी। वो जगह भी तुमसे कुछ ख़ास अलग नहीं हो सकती।

तुम्हारे ही तल की होगी वो जगह, जिस जगह तक तुम ही अपने बनाये रास्तो द्वारा पहुँच जाओ।

कृष्ण तक पहुँचने का नियम या रास्ता, कृष्ण ही जाने लेकिन ये पक्का है कि मन फैलता है; फैलता है और अंततः कृष्ण में समा जाता है और वो भी अंत नहीं होता क्योंकि कृष्ण तो खिलाड़ी हैं, वो खेल फिर फैला दते हैं, उन्हें तो खेलना है।
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आचार्य प्रशांत के सानिध्य में 31वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।

हिमालय की गोद में बैठकर आचार्य जी के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन के इस अनूठे अवसर को न जाने दें।

आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर
या
संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

शून्यता है, शून्यता के विचार से मुक्ति

शून्यता का मतलब है: शून्यता के बारे में इतनी गहरी विचारणा से मुक्ति। शून्यता का मतलब है इस गम्भीता से मुक्त हो जाना। जितनी गंभीरता

मन, समय और स्थान एक हैं

शून्यता का मतलब है: शून्यता के बारे में इतनी गहरी विचारणा से मुक्ति।
शून्यता का मतलब है इस गम्भीता से मुक्त हो जाना। जितनी गंभीरता से आप शून्यता के बारे में जानना चाह रहे हो न, तो आप खालीपन को प्राप्त होने की जगह बहुत भर गए हो। किस चीज़ से भर गए हो? खालीपन से। ‘’मैं खालीपन के बारे में विचारों से भर चूका हूँ,’’ यह सही नहीं है!
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: वी.एन.ए रिसोर्ट, ऋषिकेश

आवेदन भेजने हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर
या
संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661

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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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अमरता का वास्तविक अर्थ

आना ही भ्रम था तो जाना कैसा? इसीलिए शरीर भाव से पृथक होना, अमृत्व के लिए पहला और आखिरी कदम है क्यूंकि जन्म तो आप शरीर का ही मानते हो। जो अभी अपने आपको जन्मित मान रहा है, वो तो प्रतिपल बस मृत्यु की ही ओर बढ़ रहा है इसलिए वो खौफ़ में जीएगा। कृष्ण इसीलिए अर्जुन को समझाते है बार बार कि, अर्जुन कोई समय ऐसा नहीं था, कोई काल ऐसा नहीं था, कोई स्थिति ऐसी नहीं थी, जब मैं ना रहा हूँ, तुम ना रहे हो और ये सारे योद्धा ना रहे हों। बस इतना ही है कि मुझे वो सब याद है, तुम्हें याद नहीं। उस याद को स्मृति मत समझ लीजिएगा, उस याद का अर्थ, बोध है मुझे। ये बोध नहीं है कि, ‘’हम हमेशा से हैं,’’ क्या बोध है? कि, ‘’हम हैं ही नहीं।’’ जब कृष्ण अर्जुन से कहते हैं, ‘’अर्जुन तू मारने से क्यों डर रहा है, तू किसी को मार सकता नहीं,’’ तो उसका वास्तविक अर्थ समझिए। उसका वास्तविक अर्थ यही है कि अर्जुन, जो है ही नहीं उसे मारेगा कैसे? तू किसकी हत्या के पाप से डर रहा है, सपने में की गई हत्या का पाप लगता है?
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
आवेदन भेजने हेतु ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com पर

अन्य जानकारी हेतु संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
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