सत्संग के बावजूद भी मन में गलत ख्याल क्यों आते हैं? || आचार्य प्रशांत (2019)

तुम बड़े बेईमान पखेरू हो।

तुम न यहाँ के हो, न वहाँ के हो।

ऐसा भी नहीं कि राम के प्रति तुम्हारी बेईमानी है, तो संसार के प्रति तुम्हारी ईमानदारी है।

तुम दुनिया के भी नहीं हो।

वर्तमान में जीना माने क्या?

अभी जी लें, इसका अर्थ आपको ये समझा दिया गया है, कि जितनी इच्छाएं हैं, उनको अभी पूरा कर लें, कल पर मत टालना। जो भी तेरी वासनाएं हैं, उनमें अभी उद्यत हो जा, ज़रा भी रुकना मत। जी ले!  

तो उद्योगों की, और व्यापार की, सुविधा के लिए खूब ये मुहावरा प्रचलित किया गया है, ‘लिवंग इन द प्रेसेंट।’ आप एक गाड़ी खरीदना चाहते हैं, आपने सोचा है कि दिवाली पर खरीदेंगे। आप के पास एक आता है, बेचने के लिए तैयार। वो कहता है, अरे! लिव इन द नाउ, वाय वेट फॉर द फ्यूचर?

जो गाड़ी तुमको दिवाली पर खरीदनी है, वो अभी खरीदो। रोकते क्यों हो, अपनेआप को? ये आध्यात्मिकता में, व्यवसाय का अतिक्रमण है।  इन सबके ख़िलाफ़ जागरूक रहा करें।
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2.) आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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समस्याओं का सामना कैसे करें?

मन ऐसा तैयार करो कि वो हर स्थिति को देख ले; पूरा देखले; पार देखले। और फिर कहीं से भागेगा नहीं वो। वो सामना ही करता है। कुछ पड़ा नहीं रहने देता। तो तुम तैयार करो, साफ़ रखो। उसके बाद एक अद्भुत घटना और भी घट सकती है। वो ये कि तुम्हें किसी परिस्थिति को हल करना ही न पड़े। तुम्हारी आहट भर से परिस्थिति खुद हल हो जाए। तुम्हारी आहट भर से परिस्थिति खुद हल हो जाए। तुम्हारे आस पास समस्याएं, माया भटके ही न। नज़र तुम्हारी इतनी तेज़ हो कि देखने भर से जितना अज्ञान है, सब घुल जाए। तुम जिस कमरे में बैठे हो, अपनेआप वहाँ का माहौल ऐसा हो जाए कि अब यहाँ कोई टुच्ची बात हो ही नहीं सकती। तुम जिस घर में हो, उस घर की तबियत बदल जाए। वो सब अपनेआप होने लगेगा।
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उसके बिना तड़पते ही रहोगे

कबीर ने कोई बड़ा काम नहीं कर दिया कि किसी ऐसे को देख लिया है, जो आपको दिखाई नहीं पड़ता। कबीर ने तो बड़ा सहज काम किया है, कबीर ने उसको देख लिया है जो- चहुँ दिस है। मछली अगर कहे, ‘’मालूम है, आज बड़ी खोज की, आज पानी देखा।’’ तो आप क्या बोलोगे? ‘’चल पगली, पानी देखा! उसी में जीती है, पीती है, खाती है, कह रही है पानी देखा।’’ पर मछली के लिए इससे क्रांतिकारी खोज हो नहीं सकती कि वो पानी देख ले। मछली के लिए इससे बड़ी कोई कठिनाई हो नहीं सकती कि वो समुद्र को जान ले।
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हिमालय की गोद में 30वें अद्वैत बोध शिविर का आयोजन किया जाने वाला है।
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में रहने का और दुनिया भर के दुर्लभ ग्रंथों के अध्ययन के इस सुनहरे अवसर को न गवाएं।

तिथि: 24-27 मार्च
स्थान: टाइगर ग्रूव रिसोर्ट, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क रामनगर(उत्तराखंड)

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अहंकार सीमाएं है

अहंकार जब भी घोषणा करता है, तो अपने सीमित होने की ही करता है। अहंकार की प्रत्येक घोषणा, बस इतनी सी है, ‘’मैं छोटा हूँ। मैं छोटा हूँ और इस बात से डरता हूँ। इस कारण मैं अपने आपको थोड़ा बढ़ा-चढ़ा कर बता रहा हूँ।’’

अहंकार अपने छोटे-पन का अहसास है। अहंकार अपनी सीमितता का अहसास है।
कृष्ण उस अहसास से ऊपर उठ गए हैं तो इसलिए कृष्ण इस ‘मैं’ शब्द का बड़े निरहंकारी रूप में प्रयोग कर रहे हैं। जब कृष्ण बोलते हैं ‘मैं’, तो फिर कृष्ण नहीं हैं, ‘मैं’। वो समस्त अस्तित्व की बात कर रहे हैं। जो कृष्ण का ‘मैं’ है, यह कोई शरीर में सीमित ‘मैं’ नहीं है। यह वो ‘मैं’ है, जो पूरे अस्तित्व में व्याप्त है, फैला ही हुआ है। धूल-धूल में फैला हुआ है और यह काम एक अहंकारी आदमी नहीं कर सकता।
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भक्ति योग एवं पुरुषोत्तम योग आचार्य प्रशांत के साथ
6 मार्च से आरम्भ
आवेदन भेजने हेतु: requests@prashantadvait.com पर ईमेल करें
या संपर्क करें: +91-9818591240
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सच क्या कभी तुम्हें भाएगा?

कई मायनो में योगभ्रष्ट, वियोगी से भी ज़्यादा अभागी होता है क्यूंकि वियोगी को तो अवसर मिला नहीं; योगभ्रष्ट को मिला और वो चूक गया। तुम यहाँ आए हो — अद्वैत में — मेरे समीप, ये सौभाग्य की भी बात है और बड़े से बड़ा खतरा भी है तुम्हारे लिए। सौभाग्य इसलिए क्यूंकि मौका है, अवसर है जान सकते हो, अपनेआप को पा सकते हो, और खतरा इसमें ये है कि ये ऊँची से ऊँची संभावना है, इससे अगर चूक गए, तो अब जिंदगी भर कुछ नहीं पाओगे। क्यूंकि जो उच्चतम तुम्हें मिल सकता था वो मिला, दैव्य मेहरबान हुआ, अनुग्रह हुआ, बारिश हुई; तुम्हीं भीग ना पाए। तो बढ़िया है, अच्छा है, कोई ख़ास ही घटना होगी, जो घटनी होती है। आमंत्रण सबको आते हैं; सब आमंत्रित नहीं हो पाते। तुम आमंत्रित हो रहे हो, सौभाग्य है।
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भक्ति योग एवं पुरुषोत्तम योग आचार्य प्रशांत के साथ
6 मार्च से आरम्भ
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