जितना सर को झुकाओगे उतने शांत होते जाओगे

अब या तो टीवी के सामने झुक लो, विज्ञापनों के सामने झुक लो, कार्टून बनाने वाले हिंसक लोगों के सामने झुक लो, या सुबह उठते ही देव मूर्ति के सामने झुक लो, किताबों के सामने झुक लो, गुरु के सामने झुक लो| झुकना तो तुम्हें है ही| इस अकड़ में मत रहना कि अगर गुरु के सामने सर नहीं झुकाएँगे तो झुके नहीं, झुके तो तुम हो ही क्योंकि मन के अपने पाँव नहीं होते, मन हमेशा तो सहारा लेकर चलता ही है, लेकिन सवाल ये है किसका सहारा? या तो उसका (परमात्मा) सहारा ले लो नहीं तो फिर दुनिया में जितना लीचड़पना है तुम्हे उस का सहारा लेना पड़ेगा, सहारा तो लेना ही है|

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अद्वैत बोध शिविर

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जो तुम्हें अशांत करे, सो गलत

कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं होता। महत्वपूर्ण बस ये होता है कि जो कर रहे हो, वो तुम्हारा चैन न छीन ले। कोई भी काम महत्वपूर्ण या गैर महत्वपूर्ण नहीं होता। हमने कहा था न कि कुछ भी सही और गलत मानो ही मत, चाहे पूरी दुनिया में आग लग जाए, उसको गलत मत मानना। गलत बस एक बात; क्या?
अशांति।
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संसार के बीचोंबीच संसार से मुक्त

आपके गले में खराश हो, आप किसी ऐसे को समझा के बता दीजिये, जिसके गले में कभी खराश ना हुई हो। आप जितने शब्दों का प्रयोग करना चाहें, आप पूरा ग्रन्थ लिख कर के उसे समझा दीजिये, तो भी आप नहीं समझा सकते। तो ये नापसंदगी की बात नहीं है कि, ‘’मुझे गले की खराश नापसंद है। ये बात ये है, कि मैं जानता ही नहीं। मेरे भीतर वो ताक़त ही नहीं है कि मैं गले की खराश की बात कर पाऊँ। इसलिए मैंने कहा था, स्वास्थ्य कुछ विशेष ताक़त नहीं है। स्वास्थ्य तो, निर्विशेष हो जाना है। बीमारी और ग़ुलामी में कुछ विशेष होता है। मुझे पता ही नहीं है, तुम क्या बातें कर रहे हो।
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मन के स्रोत से निकटता ही है मन की ताकत

हमने जीवन में ये सवाल कभी ईमानदारी से पूछा ही नहीं है कि ‘महत्वपूर्ण क्या है’, क्या है जो पाने योग्य है, क्या है जो करने योग्य है? और क्योंकि हमने कभी पूछा नहीं है, हमारे भीतर खाली जगह है इसीलिए उस खाली जगह में कुछ भी कचरा भर दिया गया है।  हमने दुनिया भर के व्यापारियों को अनुमति दे दी है कि वो आएँ और हमारे मन में व्यापार करें। ये अनुमति दी हम ही ने है। समझ रहे हैं? रुकिये और पूछिए ये बात, महत्वपूर्ण क्या है? क्या ये वास्तव में महत्वपूर्ण है। और दो ही चार गिनी हुई चीजें हैं, जो समाज ने बता दी हैं कि महत्वपूर्ण हैं। उनके विषय में पूछिए कि क्या वो वास्तव में महत्वपूर्ण हैं?
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पूर्णता मुखर मौन है; तुम्हारी सारी कहानियाँ अपूर्णता की हैं

जब तक भविष्य रहेगा, तब तक हिंसा रहेगी औरआप तब तक अपने केंद्र से ही दुनिया को देखोगे। आप अपने केंद्र से ही अस्तित्व में जो कुछ है ,उसको देखोगे और उसका दोहन करना चाहोगे, शोषण करना चाहोगे। आप कहोगे, ‘’जो कुछ भी है, वो इसलिए है कि मेरे काम आ सके।’’ जंगल क्यों है? ‘’ताकि इसका पैदावार मुझे सुख दे सके।’’ जानवर क्यों हैं? ‘’ताकि मैं उन्हें खा सकूँ और उनसे श्रम ले सकूँ।’’ दूसरे क्यों हैं? ‘’ताकि मैं उनका किसी तरीके से इस्तेमाल कर सकूँ।’’ ये अहंकार का केंद्र रहेगा। आपको इस पर बैठना ही पड़ेगा। जब तक भविष्य है, तब तक अहंकार है। जब तक भविष्य है, तब तक हिंसा है।
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
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अंधी शिक्षा का नतीजा है हिंसा

जो जितना शिक्षित है, वो उतना बर्बर है; यही तुम्हारी शिक्षा है क्यूँकी शिक्षा का जो मूलभूत ढांचा है, वही झूठा है। बचपन से तुम्हें

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