गॉसिप – व्यर्थ चर्चा- मेरे जीवन का हिस्सा क्यों? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

ज़िंदा तो वो कि जिसके पास होश हो।

ज़िंदा तुम तभी जब तुम होश में हो।

जहाँ होश नहीं, वहाँ ज़िन्दगी कैसी।

हमारे साथ त्रासदी ये हो जाती है कि हम पूरी क्षमता रखते हैं ज़िन्दगी होश में बिताने की, उसके बाद भी बेहोश रहते हैं।

माहौल से प्रभावित क्यों हो जाता हूँ?

एक बच्चे के साथ ऐसा होगा और अच्छा है ऐसा हो, कि उसे बाहर से ही प्रभावित होना पड़े, क्योंकि आप एक बच्चे के विवेक पर ये नहीं छोड़ सकते कि ये जो बिजली का सर्किट है, इसमें उंगली डालनी है या नहीं। अगर वो प्रयोग करके सीखेगा, तो शायद शारीरिक रूप से बचेगा ही नहीं। एक बच्चे का प्रभावित होना स्वाभाविक है आठ साल, दस साल, बारह साल की उम्र तक, पर दिक्कत ये है कि तुम अभी तक बारह साल की उम्र के ही रह गए हो।प्रौढ़ता, व्यस्कता तुममें आ ही नहीं रही है।

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