अगर लोगों से घुलमिल न पाएँ तो || आचार्य प्रशांत (2019)

अपना भी एकांत रखो, और दूसरे को भी उसके एकांत में रहने दो।

सम्बन्ध रखो तो इसीलिये रखो कि वो तुम्हारी मदद करे, तुम उसकी मदद कर पाओ।

तुम उसे शांति दे पाओ, तुम वो तुम्हें शांति दे पाये।

इससे ज़्यादा किसी की ज़िंदगी में हस्तक्षेप, इससे से ज़्यादा किसी की के आंतरिक दायरे में प्रवेश, अतिक्रमण है।

भौतिक वस्तुओं की क्या महत्ता है? || आचार्य प्रशांत (2019)

तो बात इसकी नहीं है कि पदार्थ अच्छी चीज़ है या बुरी चीज़ है।

पदार्थ न अच्छा है, न बुरा है – अनिवार्य है।

जीव हो तुम, जीव के लिये पदार्थ अनिवार्य है।

इसका उपयोग अगर तुम कर सको ‘राम’ तक पहुँचने में, तो ये भला।

और इसी का उपयोग अगर तुम करो राम से दूर रहने के लिये, तो ये बुरा।

‘राम’ कसौटी हैं किसी भी रिश्ते की।

बुरी आदतें कैसे छोड़ें? || आचार्य प्रशांत (2019)

एक बार ये जान जाओ कि किस माहौल में, किस विधि से, किस संगति से शांति मिलती है, सच्चाई मिलती है, उसके बाद एकनिष्ठ होकर उसको पकड़ लो।

ध्यान करने बैठते हैं तो मन भटकने क्यों लग जाता है? || आचार्य प्रशांत (2019)

ऐसे ही तो करते हो न?

दिनभर जिसको खुद ही पालते हो, पोसते हो, ध्यान और अध्यात्म के ख़ास क्षणों में चाहते हो कि वो दूर ही दूर रहे।

ऐसा होगा?

मन हल्का कैसे रहे? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

‘विश्राम’ का अर्थ है – तनाव फ़िज़ूल है। इससे वो मिलेगा नहीं जो चाहिए।

तनाव अपनेआप नहीं आता है। हम तनाव को पहले बुलाते हैं, और फिर उसे हम पकड़ के भी रखते हैं।

तनाव अपने पाँव चल कर नहीं आता, आमंत्रित किया जाता है, क्योंकि हमें ऐसा लगता है कि तनाव से हमें कुछ मिल जाएगा।

संकोच माने क्या? || आचार्य प्रशांत, छात्रों के संग (2013)

जो चुप रहना नहीं जानता, वो बोलना भी नहीं जान पाएगा।

जिसको मुखर होकर बहाव में बोलने का शौक़ हो, वो पहले मौन को साधे।

जिसे निःसंकोच होकर बोलना है, वो चुप रहने की कला भी सीखे।

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