एकाग्रता क्यों नहीं बनती? || आचार्य प्रशांत (2017)

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ठंड रख! || आचार्य प्रशांत (2019)

हमें पता होना चाहिए कि इससे आगे हम नहीं झेलेंगे।

कोई भी चीज़ इस संसार की इतनी क़ीमती नहीं कि उसके लिए अपनी आत्यंतिक शांति को दाँव पर लगा दें।  

जब तक बाहर-बाहर कोलाहल है, तब तक हम बर्दाश्त कर लेंगे।

जैसे ही पाएँगे कोलाहल अब आत्मा पर छाने लगा है, हम कहेंगे, “अजी हटो!”

लड़ना हो तो शांत रहकर लड़ना सीखो || आचार्य प्रशांत (2018)

ऐसा लड़ाका चाहिए।

पुर्ज़ा -पुर्ज़ा  कट जाए उसका, अंग-अंग कटके गिर जाए लड़ाई में, फ़िर भी वो लड़ाई से हटे नहीं।

और इस सूरमा की पहचान जानते हो क्या है?

ये अपनी सारी अशांति पीछे छोड़कर जाता है।

ये सिर पहले कटाता है, फ़िर युद्ध में जाता है।

अब अशांत कौन होगा?

ये सिर अशांति का गढ़ था, वो इसको ही पीछे छोड़ आया ।

तो लड़ाई चाहिए, निश्चित रूप से चाहिए।

धर्मयुद्ध चाहिए, लेकिन धर्मयुद्ध वही कर सकता है जो बहुत शांत हो।

क्या सेक्स का कोई विकल्प है जो मन शांत रख सके? || आचार्य प्रशांत (2018)

कुछ बातों का समाधान करने के लिए भी उन बातों से उलझा नहीं जाता, बस उन बातों से आगे बढ़ जाते हैं।

आगे बढ़ जाओ, तो ये बातें पीछे छूट जाती हैं।

और इनका समाधान करने लग गए, तो इन बातों के सामने अटके रह जाओगे।

खाने और कपड़ों के प्रति आकर्षण || आचार्य प्रशांत (2018)

न कुछ अच्छा है, न कुछ बुरा है।  
मुक्ति अच्छी है, बाकि सब बुरा है।

जो कुछ मुक्ति की ओर ले जाता हो, वो बुरा हो नहीं सकता।

और वो अच्छी-से-अच्छी चीज़, जो तुम्हें मुक्ति न देती हो, बताओ वो अच्छी कैसे हुई?

ध्यान की सर्वोत्तम पद्धति|| आचार्य प्रशांत (2018)

जब शांति की गहरा तरफ़ प्रेम होता है, तो अशांति हटाने के लिए आदमी खुद ही विधियाँ खोज लेता है।

यही ‘ध्यान’ है।  

जब शांति के लिए गहरा प्रेम है, तो अशांति हटाने के लिए आदमी खुद ही उपाय खोज लेता है।

वही ‘ध्यान’ की विधियाँ हैं।

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