ईमानदारी के अलावा कोई विधि नहीं

जिन्हें दिखना होता है, उन्हें दिख जाएगा। जो इतना डूबे न हों, जो इतने खोये न हों। सही शब्द का प्रयोग किया तुमने, ‘ईमानदारी’, जिनमें ज़रा ईमानदारी हो, उन्हें दिख जायेगा। वो कहेंगे, “न, कुछ गड़बड़ है, बहुत बड़ी गड़बड़ है। मैं जिस बहाव में हूँ, वो कोई गड़बड़ बहाव है। ऐसा नहीं कि वो मुझे गलत दिशा में ले जा रहा है, वो गलत तल पर है। ऐसा नहीं कि वो मुझे किसी गलत सागर में डुबो देगा, वो बहाव ही अम्लीय है, एसिडिक है।” आप किसी ऐसी नदी में डाल दिए गए हो, जिसमें तेज़ाब ही तेज़ाब है, अब फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वो नदी किस सागर में जा कर मिलेगी।

उस नदी में डाला जाना ही तुम्हें ख़त्म कर रहा है, नष्ट कर रहा है। उस नदी में तुम्हारी मौजूदगी ही अभिशाप है तुम्हारे लिए। दिक्क्त बस इतनी है, कि क्योंकि तुम तेज़ाब की नदी में डाल दिए गए हो, इसलिए क्षण क्षण तुम घुलते जा रहे हो। तुम्हारी चेतना, तुम्हारी संवेदना नष्ट होती जा रही है। जितनी देर तुम उस नदी में रहोगे, उतना तुम्हारे लिए असम्भव हो जाएगा ये जानना कि कुछ गलत है। क्योंकि जानने के जो तंतु हैं, जानने की जो आतंरिक व्यवस्था है तुम्हारी, ठीक उस व्यवस्था को ही वो तेज़ाब खाये जा रहा है। जितनी देर तक तुम उस नदी में हो, उतनी ये सम्भावना घटती जाती है, कि तुम कभी भी कह पाओगे, कि मैं गलत बहाव में हूँ, मैं गलत नदी में हूँ। नदी ने ही ये तय कर दिया है कि अब तुम जान नहीं पाओगे।
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जिस घर में कबीर के दोहे न गाए जाते हों उस घर में गड़बड़ होना सुनिश्चित है

कूलनेस का उदाहरण देता हूँ, जो सबसे सीधा उदाहरण है| कूलनेस का उदाहरण है प्रह्लाद, की  उसको आग पर बैठा दिए तब भी नहीं जला,

जितना सर को झुकाओगे उतने शांत होते जाओगे

अब या तो टीवी के सामने झुक लो, विज्ञापनों के सामने झुक लो, कार्टून बनाने वाले हिंसक लोगों के सामने झुक लो, या सुबह उठते ही देव मूर्ति के सामने झुक लो, किताबों के सामने झुक लो, गुरु के सामने झुक लो| झुकना तो तुम्हें है ही| इस अकड़ में मत रहना कि अगर गुरु के सामने सर नहीं झुकाएँगे तो झुके नहीं, झुके तो तुम हो ही क्योंकि मन के अपने पाँव नहीं होते, मन हमेशा तो सहारा लेकर चलता ही है, लेकिन सवाल ये है किसका सहारा? या तो उसका (परमात्मा) सहारा ले लो नहीं तो फिर दुनिया में जितना लीचड़पना है तुम्हे उस का सहारा लेना पड़ेगा, सहारा तो लेना ही है|

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जो अच्छा होता है कोई उसका फायदा नहीं उठा सकता

जो अच्छा होता है कोई उसका फायदा नहीं उठा सकता| हाँ, जो अच्छा होता है उससे सबका फायदा होता जरूर है| दोनों बातों में बड़ा

चालाक आदमी को उसकी चालाकी ही भारी पड़ती है

कोई भी तुम्हें लूटता बाद में है पहले तुम्हें ललचाता है| जब तक तुम ललचाए नहीं गए तुम लुट नहीं सकते, मैं उन स्थितियों की बात नहीं कर रहा हूं कि जहाँ कोई आकर के तुम्हारे ऊपर बंदूक ही रखकर लूट ले| आमतौर पर यदि हम सौ बार लूटते हैं तो निन्यानवे बार इसलिए नहीं लूटते कि किसी ने बंदूक रखकर लुटा था, निन्यानवे बार इसलिए लुटते हैं क्योंकि किसी ने लालच का जाल बिछाया था और हम जा कर के उसमें फंस गए| और अच्छे आदमी का कोई फायदा नहीं उठा सकता, अच्छे आदमी को लूटा जा ही नहीं सकता, अच्छे होने का फायदा ही यही है कि कोई तुम्हारा फायदा नहीं उठा पाएगा अब|
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