श्रद्धा क्या है? आत्मविश्वास से श्रद्धा का क्या संबंध है? || आचार्य प्रशांत, तत्वबोध पर (2019)

तुम्हें पता होना चाहिये कि तुम्हारा हित कहाँ है।

तुम्हें दिखना चाहिये कि ये चिकित्सक तुम्हारे साथ जो कुछ भी कर रहा है, उसी में तुम्हारा फायदा है। और अगर तुम भागोगे, तो नुकसान अपना ही करोगे।

यही चीज़ तुमको अडिग रख सकती है, गुरु के पास।

और कुछ नहीं।

शमन क्या है? नित्यता क्या है? || आचार्य प्रशांत, तत्वबोध पर (2019)

‘नित्यता’ तो कसौटी है। ‘नित्यता’ कसौटी है जिसपर तुम अनित्य को वर्जित करते हो।

जिसपर तुम अनित्य को गंभीरता से लेने से इंकार करते हो।

चार महावाक्य

यह आत्मा ही ब्रह्म है| जो आत्मा को जानते हैं उन्हें आत्मा में और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं दिखाई देता| लेकिन जो शरीर की दुनिया में जीते हैं उन्हें शरीर में और संसार में सदा भेद दिखाई देता है| भेद ही नहीं, उन्हें शरीर और संसार में विरोध भी निरंतर दिखाई देता है| वो लगातार शरीर को बचाने की कोशिश में लगे रहते हैं| दुनिया से इनका रिश्ता खिंचा -खिंचा सा होता है| दुनिया से उनका रिश्ता हिंसा का रहता है|

आचार्य प्रशांत
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अद्वैत बोध शिविर

हर महीने होने वाले इन यह शिविर हिमालय की गोद में, आचार्य जी के नेतृत्व में रह कर दुनिया भर के दुर्लभ शास्त्रों के अध्ययन का अनूठा अवसर हैं।

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आध्यात्मिक ग्रंथों का शिक्षण (कोर्स)

आचार्य जी द्वारा हर माह चुनिंदा शास्त्रों पर प्रवचन एवं रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में उनकी महत्ता जानने का अवसर।

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जागृति माह

जीवन के एक विशेष विषय पर और जीवन के आम दिनचर्या की समस्याओं का हल पाने का अनूठा अवसर। जो लोग व्यक्तिगत रूप से सत्र में मौजूद नहीं हो सकते, वो ऑनलाइन स्काइप या वेबिनार द्वारा बोध सत्र का हिस्सा बन सकते हैं।

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आचार्य जी से निजी साक्षात्कार

आचार्य जी से निजी बातचीत करने का बहुमूल्य अवसर।

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सम्पादकीय टिप्पणी :

आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

सत्य न पढ़ा जाता है, न सुना जाता है, सत्य मात्र हुआ जाता है

जब इस पूरे खेल का तत्व ही छल है तो उसकी बारीकियों में क्या जाना? जब पता ही है कि जो पूरी छवि आपके सामने लाई जा रही है, वो छवि ही, स्वप्न मात्र है। तो फिर उस स्वप्न में कौन-कौन से चरित्र हैं, इस पर क्या ध्यान देना? इन बारीकियों पर क्या गौर करना? ”बड़ा जबरदस्त सपना चल रहा है,” है तो सपना ही? क्या करोगे याद कर के कि सपने में कौन-कौन था और उससे तुम्हारा क्या सम्बन्ध था? जो भी हो, जैसा भी हो, है तो सपना ही।
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प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन पच्चीस से ज्यादा अद्वैत बोध शिविरों का आयोजन करने के बाद, इस महीने की 26 तारीख को अपना 28वां बोध शिविर आयोजित करने जा रही है।

28वां अद्वैत बोध शिविर: एक पुकार परम की 💐
आचार्य प्रशांत के सानिध्य में समय बिताने और विभिन्न स्रोतों से लिए गए श्रेष्ठतम कोटि के ग्रंथों को पढ़ने का एक अनूठा अवसर है २८वां अद्वैत बोध शिविर।

शिविर का हिस्सा बनने हेतु, requests@prashantadvait.com पर एक ईमेल करें ।
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अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91-8376055661
श्री कुंदन सिंह: +91-9999102998
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।
https://href.li/?http://tinyurl.com/AcharyaPrashant-Gagan

प्राण क्या हैं?

वो जादू जो मिट्टी में प्रेम उतार देता है, उसे ‘प्राण’ कहते हैं।
इसीलिए उपनिषद् कहते हैं, “प्राण ही ब्रह्म है।”

‘वो’ कुछ ऐसा कर देता है जो हो नहीं सकता था।
राख हो जाना है आपको, और राख से ही आए हो आप।
पर इस राख की उड़ान देखो, इस राख की समझ देखो, इस राख की गहराई देखो – ये ‘प्राण’ कहलाती है, ये ‘प्राण’ है।

जीवन तभी है जब उसमें प्राण हों।
और ‘प्राण’ का मतलब साँस मत समझ लीजिएगा कि साँस चल रही है, तो मैं प्राणी हुआ।
आप प्राणवान केवल तब हैं जब आपके जीवन में ‘वो’ मौजूद है, जो आपके जीवन को जीने के क़ाबिल बनाता है,
अन्यथा आप अपने आपको मुर्दा और निष्प्राण ही मानें।

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