श्रद्धा है बुद्धि के आगे की बेवकूफ़ी

एक आदमी बिस्तर पर सोया पड़ा है। उसमें तो कुछ है ही नहीं, वो मन की ऐसा अवस्था में है जहाँ पर मन अपने ही दायरों में चक्कर काट रहा है। सोते हुए आदमी के लिए बस भूत होता है, वर्तमान जैसा कुछ होता नहीं। मन का एक दायरा है, मन उसी में चक्कर काट रहा है। फिर हुई जाग्रति, जाग्रति में तुम्हें साधन उपलब्ध होते हैं, इन साधनों का नाम है विचार, वितर्क, ज्ञान, इन साधनों का उपयोग करना है परम जाग्रति के लिए, असली जाग्रति के लिए। और असली जाग्रति जब होती है तब ये साधन छोड़ दिए जाते हैं।

ज्ञान की अपने आप में कोई कीमत नहीं है, ज्ञान सिर्फ तुम्हें जाग्रति से परम जाग्रति में ले जाने का साधन है। ज्ञान इसीलिए है ताकि ज्ञान का उपयोग करके ज्ञान को छोड़ सको। अस्मिता इसीलिए है ताकि मैं, मैं को पहचाने और मैं की व्यर्थता को जान कर के मैं का त्याग कर दे। साधारण जाग्रति से ज्यादा बड़ी जाग्रति है श्रद्धा। श्रद्धा अँधा होने का नाम नहीं है, कि कोई कहे अन्धविश्वास है श्रद्धा। श्रद्धा में तो तुम्हारी आँखें पूरी तरह खुल जाती हैं। शरीर की आँखें जब खुलें तब साधारण जाग्रति, और मन कि आँखें जब खुल जाएँ तो परमजाग्रती, उसका नाम है श्रद्धा।

~आचार्य प्रशांत
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निम्नलिखित माध्यमों से दुनिया के हर कोने से लोग आचार्य जी से जुड़ रहे हैं:-

१. आचार्य जी से निजी साक्षात्कार:
यह एक अभूतपूर्व अवसर है आचार्य जी से मुखातिब होकर उनसे निजी मुद्दों पर चर्चा करने का। यह सुविधा ऑनलाइन भी उपलब्ध है।
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२: अद्वैत बोध शिविर:
अद्वैत बोध शिविर आचार्य जी के सानिध्य में समय बिताने का एक अद्भुत अवसर है। इन बोध शिविरों में दुनिया भर से लोग, अपने व्यस्त जीवन से चार दिन निकालकर, प्रकृति की गोद में शास्त्रों का गहन अध्ययन करते हैं और उनसे प्राप्त शिक्षा की प्रासंगिता अपने जीवन में देख पाते हैं। ऋषिकेश, शिवपुरी, मुक्तेश्वर, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क, चोपटा, कैंचीधाम जैसे नैनाभिराम स्थानों पर आयोजित अनेकों बोध शिविरों में सैकड़ों लोग आच्रार्य जी के आशीर्वचनों से कृतार्थ हुए हैं।
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३. आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स:
आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स, आचार्य प्रशांत के नेतृत्व में होने वाले क्लासरूम आधारित सत्र हैं। सत्र में आचार्य जी द्वारा चुने गये दुर्लभ आध्यात्मिक ग्रंथों के गहन अध्ययन के माध्यम से साधक बोध को उपलब्ध हो पाते हैं।
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४. जागरुकता का महीना:
फाउंडेशन हर माह जीवन-सम्बन्धित एक आधारभूत विषय पर आचार्य जी के सत्रों की एक श्रृंखला आयोजित करता है। जो व्यक्ति बोध-सत्र में व्यक्तिगत रूप से मौजूद नहीं हो सकते, उन्हें फाउंडेशन की ओर से चुनिंदा सत्रों का ऑनलाइन प्रसारण उपलब्ध कराया जाता है। इस सुविधा द्वारा सभी साधक शारीरिक रूप से दूर रहकर भी, आचार्य जी के सत्रों में सम्मिलित हो पाते हैं।
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५. आचार्य जी के साथ एक दिन
‘आचार्य जी के साथ एक दिन’ एक अनूठा अवसर है जिज्ञासुओं के लिए जो, इस पहल के माध्यम से अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में हर महीने, एक पूरे दिन का समय आचार्य जी के साथ व्यतीत कर पाते हैं।
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६. पार से उपहार : आचार्य जी के साथ सप्ताहंत
‘पार से उपहार’ एक सुनहरा प्रयास है आचार्य जी के सानिध्य में रहकर स्वयं को जान पाने का। इसका आयोजन प्रति माह, २ दिन और २ रातों के लिए, अद्वैत आश्रम – ग्रेटर नॉएडा में होता है।
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७. परमचेतना नेतृत्व
नेतृत्व क्या है? असली नायक कौन है?
एक असली नायक क्या लोगों को कहीं आगे ले जाता है, या वो लोगों को उनतक ही वापस ले आता है?
क्या नेतृत्व प्रचलित कॉर्पोरेट और शैक्षिक ढाँचे से आगे भी कुछ है?
क्या आप या आपका संस्थान सही नेतृत्व की समस्या से जूझ रहे हैं?

जब आम नेतृत्व अपनी सीमा तक पहुँच जाए, तब आमंत्रित कीजिये ‘परमचेतना नेतृत्व’ – एक अनूठा मौका आचार्य प्रशान्त जी के साथ व्यग्तिगत व संस्थागत रूप से जुड़कर जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं को जानने का।
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८. स्टूडियो कबीर
स्टूडियो कबीर एक ऐसी पहल है जो आज के प्रचलित संस्कृति में आदिकाल से पूजनीय संतों व ग्रंथों द्वारा प्रतिपादित बोध का पठन-पाठन एक संगीतमय तरीके से करती है। आम जनमानस में संतों व ग्रंथों के गीतों की लोकप्रियता बढ़ सके, इसके लिए स्टूडियो कबीर उन गीतों को याद करवाने का और सुंदर गीतों के माध्यम से प्रस्तुत करने के अथक प्रयास में संलग्न है।
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९. फ्री-हार्ट्स शिविर: एक नयी दृष्टि में अध्यात्म
यह शिविर हर उस व्यक्ति के लिए है जो दिल से युवा हैं। इस शिविर के अंतर्गत आपसी सौहार्द्य और मैत्री का वर्धन, मनोवैज्ञानिक तथ्यों से रूबरू होना, जीवन की ग्रंथियों को सुलझाना, ध्यान की अभिनव विधियों का प्रयोग करना, नृत्य, गायन, कला-प्रदर्शन करना आदि शामिल है।
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१०. त्रियोग:
त्रियोग हठ-योग, भक्ति-योग और ज्ञान-योग का अभूतपूर्व सम्मिश्रण है, जिसमें सम्पूर्ण स्वास्थ्य और सर्वांगीण विकास की प्राप्ति हेतु २ घंटे के योग-सत्र का अनूठा आयोजन किया जाता है।
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११. बोध-पुस्तक
जीवन के महत्वपूर्ण विषयों पर आचार्य जी के व्यक्तव्यों का बेहतरीन संकलन हिंदी व अंग्रेजी भाषा में पुस्तकों के रूप में अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर उपलब्ध हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant

फ्लिपकार्ट: http://tinyurl.com/AcharyaBooks

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इन सुन्दरतम व अनोखी पहलों में भाग लेने के लिए, अपने आवेदन requests@prashantadvait.com पर भेजें, या श्री कुन्दन सिंह से संपर्क करें: +91-9999102998
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तुम्हारा प्रतिरोध व्यर्थ है

थोड़ा तो गौर करो, कि तुम्हारी नियति क्या है। वही हो, वहीं से आए हो, वहीं को वापस जाना है। तो क्यों अपने ही रास्ते की बाधा बनते हो, क्यों जलने से इनकार करते हो? जिधर जाना है अंततः, उधर चले ही जाओ। जो तुम हो, उसी में वापस समा जाओ। नहीं। लेकिन, रूप ले लेने का, आकार ले लेने का, माया का खेल ही यही है कि एक बार रूप ले लिया, तो उसके बाद अरूप हो जाने में भय लगता है। भले ही सारे रूप अरूप से ही जन्मते हो लेकिन रूप को दुबारा अरूप हो जाने में बड़ा भय लगता है।
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आचार्य प्रशांत से जुड़ने के माध्यम

1.) अद्वैत बोध शिविर
आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com par
या
संपर्क करें: श्री अंशु शर्मा: +91 – 8376055661

2.) आध्यात्मिक ग्रंथों पर कोर्स
आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर
या
संपर्क करें: श्री अपार मेहरोत्रा : +91 9818591240

3.) बोधसत्र का सीधा ऑनलाइन प्रसारण
आवेदन हेतु ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com
या संपर्क करें:
श्रीमती अनुष्का जैन: +91 9818585917

4.) आचार्य जी से निजी साक्षात्कार
आवेदन हेतु ईमेल करें requests@prashantadvait.com पर
या
संपर्क करें: अनुष्का जैन: +91 9818585917
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

क्रिया और कर्म के बीच अंतर

निष्काम कर्म वो, जिसमें कर्ता अनुपस्थित हो गया है। उसकी अनुपस्थिति मात्र प्रतीति नहीं है, तथ्य है।
ऐसा लग ही भर नहीं रहा है कि कोई कर्ता नहीं है, वास्तव में कोई कर्ता नहीं है क्योंकि जो कर्ता था, वो अपने ही स्रोत में मग्न हो गया है। अब जो घटना घट रही है, वो इसलिए नहीं घट रही कि उसका कोई फल अपेक्षित है। वो घटना बस घट रही है। अपेक्षाएं विलीन हो चुकी हैं, नहीं चाहिए आगे ले लिए कुछ। जो कर रहे हैं, उसी में आनंद है। जो हो रहा है, वो अपनेआप में पूर्ण आनंद ही है। वो अपनी आदि में भी आनंद है, और अपने अंत में भी आनंद है। माहौल ही आनंद का है। ये निष्काम कर्म हुआ।
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अष्टावक्र-जनक महासंवाद
आचार्य प्रशांत के साथ 6 अप्रैल से

आवेदन भेजने हेतु: requests@prashantadvait.com पर ईमेल करें
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तुम ही साधु, तुम ही शैतान

आदमी का जीवन इन्हीं दोनों के बीच की कशमकश है। आपके भीतर एक साधु बैठा है, आपके भीतर एक साँप बैठा है; साधु आपको एक दिशा खींचता है, साँप आपको दूसरी दिशा खींचता है और इन्हीं दोनों के मध्य आपका जीवन चलता रहता है। कबीर कह रहें हैं: साधु को बल दो। तुम साधु के साथ खड़े हो जाओ। याद रखना! भले घर्षण इन दोनों के मध्य हो पर इनमें से जीतेगा कौन, इसके निर्धारक तुम हो। तुम साधु के साथ खड़े रहोगे, साधु को बल मिलेगा। तुम साँप के साथ खड़े रहोगे, साँप को बल मिलेगा क्योंकि हैं तो दोनों तुम्हारे ही ना। तुम्हारे ही हैं, तो तुम्हरा होना ही तय करेगा कि दोनों में से जीतता कौन है। दोनों तुमसे बाहर के तो नहीं है, तुम्हारे ही है। तुम्हीं तय करोगे कि दोनों में जीतता कौन है।
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

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