तुम्हारी और संसार की प्रकृति है अनित्यता

प्रकृति में कुछ स्थायी भी है, कुछ अस्थायी भी है।

सिर्फ़ इसलिए कि कुछ स्थायी लग रहा है तो इसका मतलब वो प्रकृति से बाहर नहीं है, वो भी प्रकृति ही है।
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श्री प्रशांत ‘मिथक भंजन यात्रा’ का दूसरा चरण धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश में आरम्भ कर रहे हैं।

25 अप्रैल से।

कृपया अपनी जगह आरक्षित कर लें।

विचार और वृत्तियाँ ही हैं मन

मन और संसार दोनों विचार के अलावा और कुछ नहीं हैं।

यह बोध तुम्हें बहुत ही विनीत कर देता है। पर यह अहंकार के लिए बड़ा ही खतरनाक होता है क्योंकि हम लगातार इसी आधार पर ज़िन्दा हैं कि बाहर जो कुछ है, वो असली है – हमारी पहचान, हमारे रिश्ते-नाते, रुपया-पैसा, यह सब कुछ जो बाहर है वो असली है।

क्या यही मूल भ्रम नहीं है?
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श्री प्रशांत ‘मिथक भंजन यात्रा’ का दूसरा चरण धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश में आरम्भ कर रहे हैं।

25 अप्रैल से।

कृपया अपनी जगह आरक्षित कर लें।

एकाग्रता का मुद्दा || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

तुमने जैसा जीवन बिताया है, तुम्हारी एकाग्रता ठीक वैसी होगी। 

तुम्हें एकाग्रता चाहिए, तुम अपनी एकाग्रता की वस्तु बदलना चाहते हो, तो तुम्हें जीवन बदलना पड़ेगा।  

लम्बी बात है।  

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