कौनसी किताबें पढ़नी चाहिए?

13-14 साल तक अगर बच्चे इधर-उधर का ही साहित्य पढ़ा है, तो 13-14 साल बाद अगर आप उसके हाथ में कुछ अच्छा थमाएंगे भी न, तो वो उसको पढ़ नहीं पाएगा। उसको रुचि ही नहीं आएगी। वो कहेगा कि, ‘’मुझसे फिक्शन कितना भी पढ़वा लो, मैं पढ़ लूँगा पर ये बोरिंग लगता है।’’ ठीक वैसे ही जैसे आपको बोरिंग लगता है। बोरिंग इसीलिए लगता है क्यूँकी जो पूरी खुराक है, वो गन्दी हो चुकी है। पता नहीं किससे मैं बोल रहा था कि कबीर इसको बहुत अच्छे से समझाते हैं और एक ही वाक्य में सब समझा देते हैं। वो कहते हैं कि, ‘’मन को ऐसा कर लो, जैसे हंस।’ और हंस और कौवे का जो अंतर है, वो उसको सामने रखते हैं। कौवा जहाँ भी कुछ पाता हैं, उसमें चोंच मार देता है। विष्ठा, कूड़ा, गन्दगी में चोंच डाल देगा वो। हंस भूखा मर जाएगा, पर गन्दगी में चोंच नहीं डालता वो, आकर्षित ही नहीं होता। तो इसीलिए कहते हैं कि वो सिर्फ़ मोती चुग-चुग के खाता है।
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जीवन गँवाने के डर से अक्सर हम जीते ही नहीं

जब आदेश का पालन करते हो, तो फिर जहाँ से आदेश आता है, वहीँ से उस आदेश के पालन की ऊर्जा भी आ जाती है। वही दे देता है उर्जा, और वही एक मात्र उम्मीद है तुम्हारी, वहीं से जीत है तुम्हें, और कहीं से नहीं मिलेगी। भूलना नहीं कि तुम्हारी अपनी ऊर्जा तो तुम दूसरों को दे आए हो, तुमने अपनेआप को तो बेच ही दिया है। तुम्हारी अपनी बंदूक तो अब तुम्हारे ऊपर ही चलेगी। ये संसार तुम्हारे ऊपर जो बंदूके ताने बैठा है ये संसार ये नहीं है, ये तुम्हारी बंदूके हैं। ये दुनिया जो तुम्हें बन्धनों में कसे बैठी है, ये हक़ दुनिया को किसने दिया? तुमने दिया।
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न चिंता न चाहत, स्वभाव तुम्हारा है बादशाहत

ये जो मुंह का लटकाना है, इसको समझलो ये सज़ा है। कोई न कोई तो रहा होगा जिसने प्रेम से समझाया होगा। कहीं से तो आवाज़ आई होगी कि “मान जाओ। ” जब नहीं माने, करली अपनी, तो फिर मिलती है सज़ा। और उससे बच तो पाते नहीं। कोई व्यक्ति मारता है, तो शिकायत भी कर पाते हो, परिस्थितियाँ ऐसा थपेड़ा देती हैं कि शिकायत भी नहीं कर पाते। पर उनके पंजों के निशान गाल पर ज़रूर नज़र आते हैं। अब किसके खिलाफ शिकायत दर्ज कराओगे? अब बस यही बोल पाते हो, “अरे! किसमत खराब है। मैं क्या करूँ? मेरे साथ ऐसा हो गया। ”
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तुम्हारा प्रतिरोध व्यर्थ है

थोड़ा तो गौर करो, कि तुम्हारी नियति क्या है। वही हो, वहीं से आए हो, वहीं को वापस जाना है। तो क्यों अपने ही रास्ते की बाधा बनते हो, क्यों जलने से इनकार करते हो? जिधर जाना है अंततः, उधर चले ही जाओ। जो तुम हो, उसी में वापस समा जाओ। नहीं। लेकिन, रूप ले लेने का, आकार ले लेने का, माया का खेल ही यही है कि एक बार रूप ले लिया, तो उसके बाद अरूप हो जाने में भय लगता है। भले ही सारे रूप अरूप से ही जन्मते हो लेकिन रूप को दुबारा अरूप हो जाने में बड़ा भय लगता है।
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जागरण का ताप ही वृत्तियाँ जला देगा

बच्चा नहीं पैदा होता, वृत्तियों का एक पुंज पैदा होता है। उसे जाना होता है, उसे ख़त्म होना होता है। कई लोग सोचते हैं कि व्रत, उपवास रखे ऋषियों ने, इससे उनको मुक्ति मिल गयी, मोक्ष मिल गया। बड़े-बड़े तपस्वी हुए हैं, जिन्होंने बड़ी तपस्या करीं हैं। महावीर का नाम आता है, बुद्ध का नाम आता है। शरीर गला दिया, हाड़ सुखा दिया। ये सब किसलिए था ज़रा समझो तो, मास गलाने से किसी को मुक्ति नहीं मिल जानी हैं। पर मांस गलाना एक प्रकार का मानसिक अभ्यास है। शरीर महत्व नहीं रखता, मन महत्व रखता है।
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नींद और मौत क्या बताते हैं?

दो तरह के लोग होते हैं जो किसी धर्म ग्रन्थ का अर्थ करते हैं, एक वो जो वही धर्मावलम्बी हैं, वो अनर्थ करेंगे पक्का, और दूसरे वो जो विरोधी हैं। कुरान को आप ऐसे लोगों के हाथ में दे दीजिये जो इस्लाम को नहीं पसंद करते, वो कुरान का ऐसा भयानक अर्थ निकालेंगे, कि देखो ये तो बड़ा ही गिरा हुआ ग्रन्थ है। एक तरफ वो लोग बैठे हुए हैं जो कहेंगे कि हम तो बिलकुल डूबे हुए हैं श्रद्धा में और देखो इसका ये अर्थ है। वो भी उल्टा-पुल्टा अर्थ कर रहे हैं, दूसरी ओर वो लोग बैठे हुए हैं जो गहरायी से नफरत में डूबे हुए हैं, वो भी उल्टा अर्थ करेंगे। समयक अर्थ करने के लिए आपको न तो विश्वाशी होना है ना अविश्वाशी होना है, आपको ध्यानस्थ होना है। बड़े गौर से, बड़े शांत चित्त के साथ उसमें उतरना है, तब जा कर के पता चलता है कि बात तो इतनी दूर की थी।
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अष्टावक्र-जनक महासंवाद
आचार्य प्रशांत के साथ 6 अप्रैल से

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