जीव के लिए ही मृत्यु है

देह होने का अर्थ ही यही है कि समस्त जीवन का एक ही औचित्य रह जाएगा: मौत से बचना, क्यूंकि जीवन की निष्पत्ति मात्र मृत्यु ही है देह के लिए। देह और कहीं को जा ही नहीं रहा, देह सिर्फ़ मौत की ओर जा रहा है और आप मरना नहीं चाहते। अब आप जो कुछ भी करोगे, आप की सांस-सांस में सिर्फ़ मौत का भय होगा। आप अपने आस-पास के संसार को देखिए, उनकी गतिविधियों को देखिए, आप पाएँगे कि सब कुछ सिर्फ़ मौत के भय से चालित है; आप दुनिया के विस्तार को देखिए, आपको उसमें सिर्फ़ मौत का विस्तार दिखाई देगा।
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29वां अद्वैत बोध शिविर
24 से 27 फरवरी, शिवपुरी, ऋषिकेश
आवेदन भेजने हेतु ई-मेल भेजें: requests@prashantadvait.com पर

अन्य जानकारी हेतु संपर्क करें:
श्री अंशु शर्मा: +91 8376055661
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आचार्य प्रशांत द्वारा दिए गये बहुमूल्य व्याख्यान इन पुस्तकों में मौजूद हैं:

अमेज़न: http://tinyurl.com/Acharya-Prashant
फ्लिप्कार्ट: https://goo.gl/fS0zHf

एक को जाने बिना लिया अनेकों का ज्ञान, यही मूल अज्ञान है यही दुःख की खान

कबीर समझाते-समझाते थके जा रहे हैं कि तुम्हें उसके जैसा होना है और तुम्हारी पूरी कोशिश क्या है? उसको अपने जैसा बना लेने की। अहंकार देख रहे हो? तुम कहते हो कि परम भी जैसा परम होगा तो होगा, पर हमसे तो नीचे ही है। तुम होगे बड़े ऊँचे, हमसे तो नीचे ही हो। हमारे सामने तो हमारे जैसे रहो। हमारी दुनिया में तुम हमारे जैसे रहो। जो तुमको खाना-पीना पसंद है वो तुम उनको भी खिला आते हो।
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‘आएँ और प्रकाश से अनुग्रहित हों’,

आचार्य प्रशांत द्वारा शब्द योग सत्र में।

दिन एवं दिनांक- रविवार, 30.10.2016
समय: प्रातः 9:00 बजे से
स्थान: तीसरी मंजिल, G-39, सेक्टर- 63 , नॉएडा
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कबीर के वचनों को समझने का प्रयत्न मानवता ने बारम्बार किया है। किन्तु संत को समझने के लिए कुछ संत जैसा होना प्रथम एवं एकमात्र अनिवार्यता है। संत जो कहते हैं उनके अर्थ दो तलों पे होते हैं – शाब्दिक एवं आत्मिक। समाज ने कबीर के वचनों के शाब्दिक अर्थ कर, सदा उन्हें अपने ही तल पर खींचने का प्रयास किया है, आत्मिक अर्थों तक पहुँच पाना उसके लिए दुर्गम प्रतीत होता है। आचार्य प्रशांत ने उन वचनों के आत्मिक अर्थों का रहस्योद्घाटन कर कुछ ऐसे मोती मानवता के समक्ष प्रस्तुत किये हैं जो जीवन की आधारशिला हैं। आज की परिस्थिति में जीवन को सरल एवं सहज भाव में व्यतीत कर पाने का साहस, आचार्य जी के शब्दों से मिलता है।

कबीर, जो सदा सत्य के लिए समर्पित रहे, उनके वचनों के गूढ़ एवं आत्मिक अर्थों से अनभिज्ञ रह जाना वास्तविक जीवन के मिठास से अपरिचित रह जाने के सामान है, कृपा को उपलब्ध न होने के सामान है।

प्रौद्योगिकी युग में थपेड़े खाते हुए मनुष्य के उलझे जीवन के लिए ये पुस्तक प्रकाश स्वरुप है।

http://tinyurl.com/AcharyaPrashant-Gagan

मूर्ति द्वार है अमूर्त का

संगति ही सब कुछ है – और मीरा ने कर ली है कृष्ण की संगति। तुम देखो तुमने किसकी संगति करी है?

मन तो प्रभावों के संकलन का नाम है, जैसे माहौल में उसे रखोगे वैसा हो जाएगा; तुम देखलो कि तुमने उसे कैसे माहौल में रखा है?

मीरा को कृष्ण के अलावा और कुछ दिखाई नहीं देता था, दिन-रात वो कृष्ण के साथ ही रहती हैं। तुम देखो कि तुम्हारी आँखों के सामने किसका चित्र घूमता है हर समय? सुबह उठते हो तो कौन-से भगवान की शक्ल दिखाई देती है? आँख खोलते हो तो सामने कौन-सी देवी मौज़ूद रहती है?

जिनकी शक्ल दिन-रात देख रहे हो वैसे ही हो जाओगे।

भ्रांत कौन, और किसके लिए?

अंतर्विकल्पशून्यस्य बहिः स्वच्छन्दचारिणः। भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्-तादृशा एव जानते॥ – अष्टावक्र गीता (१४- ४) अनुवाद : भीतर से निर्विकल्प और बाहर से स्वच्छंद आवरण वाले, प्रायः भ्रांत

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