गुस्से में चीखने-चिल्लाने की समस्या || आचार्य प्रशांत (2018)

जिसे दूसरे को समझाना हो कि क्या सही है, क्या ग़लत है, उसे अपने सारे दोष साफ़-साफ़ पता होने चाहिये।

अगर अपने ही मन की ख़बर नहीं, तो तुम वैसे ही हो, जैसे दूसरा है। उसे भी अपने मन की ख़बर नहीं। इसलिए समझा नहीं पाओगे।

दूसरे को जब समझाने निकलना, तो ये साफ़-साफ़ समझना, दूसरा तुम्हारे शब्दों से कम, तुम्हारी हस्ती से ज़्यादा समझता है।

तुम्हारी बात बहुत ऊँची होगी, पर तुम उतने ऊँचे दिखते ही नहीं, तो वो तुम्हारी बात की कद्र, नहीं करेगा।